हिंदीसेवियों के बीच फिजी में बिताए यादगार दिन
जी गोपीनाथन

            सुवा, फिजी, ३१ मार्च: सिडनी से आज बारह बजे की उड़ान से सुवा, फिजी पहुंचे। सब कहीं पानी और हरियाली। अनेक द्वीपों का समूह है फिजी। ३पर से मरकत द्वीप समूह जैसा दिखाई देता है। छोटे से हवाई अड्डे में कोई दिक्कत नहीं हुई। केवल वापसी टिकट मांगी गई। बाहर आए तो भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद् के फिजी केंद्र के निदेशक डॉ. महावीर सिंह से मिले। वे कुछ समय से फिजी में काम कर रहे हैं। वे यहां पर योग, भारतीय संगीत आदि के शिक्षण कार्य द्भम के दो केन्द्र चला रहे हैं। मेरे लिए तानोवा प्लाजा होटल के कमरा बुक किया गया था। बातचीत में डॉ. सिंह ने कहा कि परसों फिजी में हिंदी अध्यापक परिषद् की एक मीटिंग रखी गई है, उनसे बातें होंगी। दक्षिण पेसिफिक विश्वविद्यालय की हिंदी अध्यापिका इंदु चंद्रा के भी अगले दिन मिलने की बात कही।

            होटल हवाई अड्डे से काफी दूर है। रास्ते के दृश्य मुझे केरल, श्रीलंका आदि की याद दिला रहे थे। लगभग वैसे ही नारियल तथा अन्य फलदार सघन वृक्ष और पौधे आदि। फिजी में ३०० से अधिक छोटे-बड़े द्वीप हैं। पर्यटन और खेती ही उनकी आय का प्रमुख स्रोत है। भारतीयों को यहां सन् १८७९ मंे गिरमिटिया प्रथा के अंतर्गत गन्ना तथा अन्य खेती के लिए लाया गया था। यहां के मूल निवासी आदिम जनजाति के लोग हैं, जमीन के मालिक भी वे ही हैं। अंग्रेजों के जमाने में उन्होंने जमीन पट्टे पर दी थी, जिस पर भारतवंशी किसान-मजदूर काम करते आए। सन् १९७० में आजादी मिलने के बाद अंग्रेज तो चले गए, लेकिन भारतवंशी लोग यहीं रह गए। शायद अब उस पट्टे की अवधि भी समाप्त होने की है। लेकिन भारतवंशी तो अब यहां के नागरिक हैं और उन्हें मताधिकार भी प्राप्त है। फिर भी यहां का राजनीतिक और सामाजिक माहौल ऐसा है कि मूल देशवासियों का ही सरकारी सेवा में वर्चस्व है। व्यापार, व्यवसाय, शिक्षा आदि क्षेत्रों में भारतीय आगे हैं। फिजियन शिक्षित लोगों से भारतीयों का अच्छा ही संबंध है, गांवों के सामान्य लोगों के बीच भी संबंध ठीक हैं। लेकिन एक असंतुष्ट वर्ग भी है जिनके कारण भारतीय अपने को असुरक्षित महसूस करते हैं। कहते हैं, ये आदिवासी अच्छे और भोले हैं। एक जमाने में भारतीयों के प्रति उनका अच्छा ही दृष्टिकोण था। लेकिन बदलती राजनीतिक और आर्थिक स्थितियों के कारण संबंध बिगड़ता गया। सेना में यही लोग हैं, जो किसी भी समय शासन के खिलाफ विद्रोह भी कर सकते हैं। जनतंत्र में यही एक सफलता है कि फिजियन भाषा और अंग्रेजी के साथ ही हिंदी भी संसद द्वारा मान्य राजभाषा है। यहां के भारतवंशी व्यापार, शिक्षा, नौकरी आदि के लिए ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड आदि चले जाते हैं, फिर भी बहुसंख्यक लोग यहीं टिके हुए हैं- जनतंत्र में स्थितियां ठीक होने की उम्मीद को लेकर।

            रात को जोरों की बारिश शुरू हुई। विशाल समुद्र के बीच में होने से कभी तूफान, बाढ़, भूकंप, सुनामी जैसी आपदाएं भी यहां हो सकती हैं, अग्नि पर्वत से बने कुछ पहाड़ भी दीख रहे थे। फिर भी अपेक्षाकृत शांत वातावरण और समुद्र तट हॆं, जिसे पर्यटक पसंद करते हैं। होटल में विदेशी यात्री ही ज्यादा थे। बारह बजे के करीब मैं सो गया।

            १ अप्रैल: सूरज की किरणें बहुत ही सुखद लग रही थीं। श्रीमती इंदु चंद्रा अपने बेटे को लेकर आईं। उन्होंने समुद्र तट काफी घुमाकर दिखाया और अपने विश्वविद्यालय में भी ले गईं। डिग्री स्तर पर हिंदी एक विषय के रूप में पढ़ाई जाती है, जिसमें भाषा और साहित्य दोनों के पाठ्य द्भम हैं। पहले डॉ. विवेकानंद शर्मा यहां अध्यापक थे, अब वे अवकाश ग्रहण कर चुके हैं। इंदु चंद्रा मुझे फिजी सेवाश्रम संघ के भवन में ले गईं और वहां के स्वामी संयुक्तानंदजी ने खुशी से स्वागत किया। वे प्रसिद्ध योगी प्रणवानंदजी के शिष्य हैं। स्वामी प्रणवानंदजी ने भारत सेवाश्रम नामक संस्था की स्थापना की थी। भारतवंशी-बहुल देशों में यह संस्था बहुत अधिक सेवा का कार्य करती है। स्वामी संयुक्तानंदजी मूल बांग्ला भाषी होते हुए भी हिंदी, फिजियन और गुजराती बोलते हैं। वे युवा लोगों के लिए योग और भारतीय संस्कृति के कार्य द्भम सफल ढंग से चला रहे हैं। यहां योग की लोकप्रियता के कारण ही भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद् भी अब योग प्रशिक्षण देता है। तूफान, बाढ़ आदि प्राकृतिक आपदाओं के समय भी फिजी सेवाश्रम संघ के सदस्य द्वीपों में जाकर लोगों की सेवा करते हैं। स्वामीजी ने यहां के भारतवंशियों के प्रयास से बन रहे फिजियन विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. राजेश चंद्रा से टेलीफोन पर बात कराई। वे एक अन्य द्वीप में थे। इस विश्वविद्यालय में भी हिंदी का अध्ययन शुरू करने की बात सोच रहे हैं। आर्यसमाज और सनातन धर्म सभा यहां सि द्भय हैं और दोनों के दृष्टिकोण में जो अंतर है, उसके कारण दोनों में मतभेद भारत की तरह फिजी में भी रहता है। फिर भी वे हिंदी के मामले में मिल-जुलकर काम करते हैं। हिंदी उनके लिए भारतीय अस्मिता की प्रतीक सांस्कृतिक भाषा है। स्वामी संयुक्तानंद जैसे सामाजिक कार्यकर्ता लोग दोनों को मिलाने का काम कर रहे हैं। शाम को यहां के प्रसिद्ध हिंदी लेखक और भूतपूर्व मंत्री विवेकानंद शर्मा से मिलने गए। वे 'संस्कृति' नामक पत्रिका चलाते हैं। फिजी हिंदी महापरिषद के वे सयोजक हैं। यह हिंदी अध्यापकों और लेखकों का संगठन है। श्री महेंद्र चौधरी के साथ वे राजनीति में भी सि द्भय हैं। विवेकानंद शर्मा ने 'प्रशांत की लहरें', 'अनजान क्षितिज की ओर' आदि हिंदी उपन्यास लिखे हैं। फिजी में तोताराम सनाढ्य, पं. रामचन्द्र शर्मा की कीर्तन विशारद, हाल ही में दिवंगत कमला प्रसाद मिश्र आदि अनेक हिंदी लेखक और हिंदी पत्रकार हुए हैं जो हिंदी की मौन साहित्य साधना करते रहे हैं। आजकल तो अनेक हिंदी लेखक और लेखिकाएं यहां पर हिंदी में साहित्य सृजन कर रहे हैं। वर्तमान साहित्यकारों के लिए भी भारतीय मिथक व पुराण तथा सांस्कृतिक गं्रथ प्रेरणा के स्रोत हैं। फिजी जीवन के संघर्ष को भी उन्होंने वाणी दी है। योगेंद्र सिंह कंवल, ज्ञानीदास, श्रीमती कमला सिंह और विवेकानंदजी उनमें से प्रमुख हैं। विवेकानंदजी अब भी अपने ग्रामीण परिवेश में रहकर लेखन कार्य में सि द्भय हैं। आजकल भारतीय लेखकों के साथ ही फिजी के ंहिंदी लेखकों की रचनाएं भी पाठ्य पुस्तकों के रूप में स्थान ग्रहण कर रही हैं। अखबार एवं टीवी में हिंदी खूब चलती है और संसद में भी फिजियन के साथ-साथ हिंदी का प्रयोग होता है। अंग्रेजी भाषा शिक्षा और नौकरी की दृष्टि से महत्वपूर्ण है, लेकिन हिंदी भारतवंशियों के लिए उनके मूल देश से मिलने वाली भाषा है। इसलिए वे इसे जीवित रखना चाहते हैं। रेडियो, टीवी कार्य द्भम, टीवी के माध्यम से हिंदी विज्ञापन, लोकप्रिय हिंदी सिनेमा, धारावाहिक आदि हिंदी को यहां जीवित रखने में सहायक हैं। उदयाचल, प्रशांत समाचार, शांतिदूत, फिजी समाचार, दीनबंधु जय फिजी आदि अनेक पत्र-पत्रिकाएं यहां चलती हैं। विश्वविद्यालय में भी ंहिंदी पत्रकारिता अध्ययन का एक प्रखर विषय है। पर्यटन और आतिथ्य यहां का अन्य लोकप्रिय विषय है। फिजियन लोग भी हिंदी फिल्म संगीत के प्रेमी हैं। फिजियन हिंदी का रूप यहां के लोकगीतों और ग्रामीण लोगों के वार्तालाप में खूब मिलेगा।

            २ अप्रैल: सुबह मुझे कोई महिला आकर फिजी सेवाश्रम ले गईं। वहां पर शिक्षण कालेज के प्राचार्य मिले। हिंदी अध्यापकों का प्रशिक्षण यहां दो कालेजों में होता है। फिर विवेकानंदजी और उनकी बेटी आकर मुझे घुमाने ले गए। वह फिजी समुद्र-तट पर जहां पहली बार 'लियोनीदास' नामक जहाज में भरकर भारत से गिरमिटिया लोगों को लाया गया, वह सब दिखाया। फिजी में टोरिन, टैपियोका आदि अनेक कंद-मूलों और भारत के जैसे फलों, सब्जियों आदि की खेती होती है। गन्ने की खेती और चीनी उत्पादन में तो भारतीयों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। गुजराती होटल में भारतीय खाना भी खाया, पति-पत्नी जो होटल चलाते हैं, वे विवेकानंदजी के शिष्य हैं। हिंदी के प्रति अनुराग तो सर्वत्र है।

            ढाई बजे डॉ. महावीर सिंह और फिजी हिंदी संगठन के कार्यकर्ता आए। आर्य समाज महिला कॉलेज के हॉल में हिंदी अध्यापक परिषद् की बैठक हुई। करीब पचास लोग, हिंदी अध्यापक, प्राचार्य और आमंत्रित नागरिक थे। ये सब लोग हिंदी से किसी-न-किसी रूप में जुड़े हुए लोग हैं। वैदिक मंत्र, गीत, कविता आदि के साथ कार्य द्भम शुरू हुआ। मैंने अपने वक्तव्य में भारत की संपर्क भाषा और विश्व भाषा हिंदी के बारे में और महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के कार्यकलापों के बारे में बताया। चर्चा सत्र बहुत ही उपयोगी था। उल्लेखनीय है कि यहां गुजराती, मलयाली, तमिल, बांग्ला, पंजाबी और हिंन्दी भाषी सारे भारतवंशी लोग हिंदी के माध्यम से जुडे हैं। नई पीढ़ी के बीच भी हिंदी को लोकप्रिय बनाने का प्रयास ये लोग कर रहे हैं। लेकिन भारत को भी इसमें सहयोग देना चाहिए। फिजी में हिंन्दी की अनेक अध्यापिकाएं और लेखिकाएं भी हैं। कुछ कवयित्रियों ने अपनी रचनाएं भी सुनाईं। भारत में बनाई गई पाठ्य-पुस्तकों को यहां के अध्यापक अपर्याप्त महसूस कर रहे हैं। पाठ्य-पुस्तकों में वे फिजी के जीवन से संबंधित सामग्री भी चाहते हैं। हिंदी अध्यापकों को भारत भेजने के लिए भी सक्षम योजनाएं होनी चाहिएं। फिजी के विश्वविद्यालयों के साथ भी सहयोग की आवश्यकता है। इस दिशा के उच्चायोग एवं विदेश मंत्रालय की विशेष भूमिका होनी चाहिए। ब्रिटिश काउंसिल जैसे अंग्रेजी को बढ़ावा देने के लिए काम करता है, उसी तरह भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद् आदि को हिंदी और भारतीय संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए फेलोशिप आदि की व्यवस्था करनी चाहिए, ये बातें भी चर्चा में उभरीं। शाम को एक सुदूर गांव में स्वामी संयुक्तानंदजी के साथ गए, जहां रामायण मंडली रामचरितमानस का पाठ और कीर्तन कर रही थी। गांव के काफी युवा लोग और महिलाएं एवं बच्चे उपस्थित थे। संयुक्तानंदजी ने बताया कि ऐसी मंडलियां यहां के गांव-गांव में सि द्भय हैं। फिजी में रामायण ने गिरमिटिया लोगों के संघर्ष के दिनों में हिंदी और भारतीय संस्कृति को बचाए रखने में महान भूमिका निभाई है। इसीलिए वे तुलसीदास को श्रद्धा से स्मरण करते हैं। सभी द्वीपों में रामलीला का उत्सव होता है। रामलीला नाटक और गायन के माध्यम से नई पीढ़ी भी यहां रामायण की कथाओं को जीवित रखती है। तुलसी रामायण यहां के भारतवंशियों के लिए सबसे प्रेरक ग्रंथ है। जन्म, मरण, त्योहार सब में रामायण की भूमिका रहती है। अदालत में लोग इसी से कसम खाते हैं। महिलाओं ने यहां रामायण संस्कृति को घरों में और गांवों में जीवित रखा है, जिससे फिजी के मूल निवासी भी प्रभावित हैं। यहां के भारतीय त्योहारों में वे भी भाग लेते हैं। कई मूल निवासी अपनी काईबीती भाषा के साथ हिंदी भी समझते और बोलते हैं।

            ४ अप्रैल: ऑस्ट्रेलिया जैसे विकसित देश के करीब होने के बावजूद फिजी अब भी बहुत पिछड़ा देश है। इसके प्राकृतिक संसाधनों को लूटने का ही काम उपनिवेशवादी शक्तियों ने किया था। भारतीय इन उपनिवेशवादियों द्वारा लाए गए थे, इसलिए यहां के लोगों की दृष्टि में भारतीय भी उनका शोषण करते हैं। लेकिन अब स्थितियां बदल गई हैं, भारतवंशी भी यहां के नागरिक हैं और उनका इस देश के विकास में भी योगदान हो रहा है। दुनिया तेजी से भाग रही है, लेकिन यहां तो बहुत ही धीमी गति से, शांति से हर काम होता है। सुबह जो टैक्सीवाला आया वह बहुत आहिस्ते से ले गया हवाई अड्डे की ओर। मैं डर रहा था कि कहीं देरी न हो जाय। बड़े निश्चिंत जीव लगे यहां के लोग, विशेषकर मूल निवासी। आप्रवासी भारतीय अपनी चिंताओं से ग्रसित तनावों में रहते ही हैं।

            हवाई अड्डे पर कोई जल्दबाजी नहीं। बैग वगैरह चेक करने की मशीन खराब। फिर चेक, इनमें भी कम्प्यूटर की धीमी चाल। फिर विमान के आने की देरी। सुवा के छोटे से हवाई अड्डे से नांदी के बड़े हवाई अड्डे तक छोटे से हवाई जहाज में पहुंचे, वहां से सिडनी के लिए निकले। फिजी छोटा सा स्वतंत्र देश है, लेकिन इसके अर्थतंत्र को ऑस्ट्रेलिया जैसी बड़ी आर्थिक शक्तियां अब भी नियंत्रित कर रही हैं, ऐसा लगता है। अन्य आर्थिक पक्षों की तरह एयर पेसिफिक भी ऑस्ट्रेलिया के ही अधीन है। उपनिवेशवादी फंदों से पूरी तरह छुटकारा पाने के लिए स्वदेशी की अवधारणा, इनके संदर्भ में भी संगत लगता है, इसलिए हिंदी भी इनके लिए महत्वपूर्ण है। गिरमिटिया प्रथा को खत्म करने में एक जमाने में गांधी इनके लिए प्रेरणा-स्रोत रहे हैं। संसद् ने हिंदी को मान्यता दी है, यह तो बड़ी उपलब्धि है, लेकिन हिंदी को उसका पूरा अधिकार फिजी देश में ये लोग तभी दिला पाएंगे जब भारत में भी हिंदी की स्थिति मजबूत होगी। फिजी देश अपनी हर प्रेरणा और सांस्कृतिक स्रोत के रूप में भारत की ओर नजर लगाए हुए है, इसलिए हमें भी उनके देश की भावनाओं के अनुरूप काम करना चाहिए।

(लेखक महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा, के उपकुलपति हैं )।
(प्रभासाक्षी, नई दिल्ली २८ अगस्त २००६ से 'साहित्य अमृत : साभार')