विश्व जाल पत्रिका अनुरोध भारतीय भाषाओं के प्रतिष्ठापन के लिए समर्पित समस्त संस्थाओं को एकमंच पर लाने हेतु प्रयासरत है। इस विश्व-जाल पत्रिका का प्रकाशन एवं संपादन अवैतनिक अव्यावसायिक एवं मानसेवी होकर समस्त हिन्दी प्रेमियों को समर्पित है।

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माह सितम्बर-२००९

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संपादकीय

लो फिर आ रहा है ‘‘हिन्दी-दिवस’’

लो फिर आ रहा है ‘‘हिन्दी-दिवस’’ 14 सितम्बर, 2009 ‘‘हिन्दी-दिवस’’ फिर आ रहा है। फिर शुरू हो गये हैं ‘‘हिन्दी-मास’’ जैसे सरकारी आयोजन। ‘‘हिन्दी-सप्ताह’’ शुरू होने वाले हैं। और फिर अंत में ‘‘हिन्दी-दिवस’’ तो है ही। फिर शुरू होंगे हिन्दी के नाम पर वाह-वाही लूटने के कार्यक्रम, सम्मानों के कार्यक्रम। और इस देश की गरीब जनता की गाड़ी कमाई का एक अंश इन कार्यक्रमों की भेंट चढ़ जायेगा। कुछ संस्थाएं सरकारी खर्चे पर तो कुछ अपने खर्चे पर आयोजन करेंगी, हिन्दीसेवियों को सम्मानित करेंगी, कुछ प्रस्ताव पारित करेंगी और शासन को भेजेंगी। लेकिन शासन के स्तर पर क्या कार्रवाई हुई यह ज्ञात ही नहीं हो पाता। मैंने भी कई आयोजन किये। अंग्रेजी में छपी सामग्री की होली जलवाई, राष्ट्रीय बैठकंे कीं, रैली निकाली, ज्ञापन भिजवाये, लेकिन बड़े ही दुख के साथ लिखना पड़ रहा है कि मुझे आज तक न तो राष्ट्रपति की ओर से, न ही प्रधानमंत्री की ओर से और न ही राज्यपाल की ओर से कोई पत्र मिला। हाँ वर्षों पहले राजभाषा विभाग, गृह मंत्रालय से एक पत्र मिला था जिसमें लिखा था कि आपके सुझावों पर उच्च-स्तरीय समितियों में विचार-विमर्श हुआ है। एक बार अटल जी का पत्र भी मिला था जब वे नेता प्रतिपक्ष थे।

लेकिन मन में एक लगन है जिसके वशीभूत होकर हिन्दी-दिवस पर होने वाले कार्यक्रमों में जाना नहीं छोड़ पाता। एक आशा है कि कभी न कभी तो इस देश को अपनी भाषा अवश्य ही मिलेगी जैसा कि गांधी जी चाहते थे, राम मनोहर लोहिया चाहते थे। अब इसे जुनून ही कहा जायेगा, मैंने केन्द्रीय सरकारी सेवा से ग्यारह वर्ष पूर्व जिन दो संकल्पों को पूर्ण करने हेतु स्वैच्छिक सेवा-निवृत्ति ली हैं उनमें एक संकल्प राष्ट्रभाषा के प्रतिष्ठापन का भी है। देखो अपने संकल्प में ईमानदारी से कहाँ तक सफल हो पाता हूँ।

कुछ वर्षों से ‘‘अनुरोध’’ पत्रिका का प्रकाशन बंद है। उसे भी पुनः प्रारंभ करने का प्रयास कर रहा हूँ। ताकि पुनः अपने संकल्प को पूर्ण करने में जुट सकूँ।

इस वर्ष की दो महत्वपूर्ण घटनाओं का जिक्र इस अवसर पर करना चाहूँगा। एक तो पड़ौसी देश नेपाल का जहाँ उपराष्ट्रपति श्री परमानंद झा द्वारा हिन्दी में ली गई उपराष्ट्रपति की शपथ को वहाँ के उच्चतम न्यायालय ने अवैध घोषित किया है और उन्हें वहाँ की राजभाषा नैपाली में शपथ लेने को कहा गया है। इस घटना से नेपाल में नेपाल की एक संस्था द्वारा हिन्दी को नेपाल की दूसरी राष्ट्रीय भाषा का दर्जा दिये जाने मांग की जाने लगी है। तो दूसरी ओर एक दूसरी संस्था द्वारा उन्हें नेपाली में शपथ न लेने पर हत्या की धमकी दी जा रही है।

कैसी विडम्बना है एक ओर वहाँ की राजभाषा में शपथ लेने हेतु वहाँ का उच्चतम न्यायालय उपराष्ट्रपति को बाध्य कर रहा है तो दूसरी ओर हमारे देश के ‘‘विधि आयोग’’ द्वारा भारत के उच्चतम न्यायालय में राजभाषा हिन्दी के स्थान पर गुलामी के समय थोपी गई भाषा अंग्रेजी के वर्चस्व को बनाये रखने की पुरजोर सिफारिश की गई है। कितना अजीब लगता है, जिस देश के संविधान में देश के राजकाज में अंग्रेजी के स्थान पर राजभाषा के रूप में हिन्दी को अपनाने की बात की गई हो, राजभाषा विभाग द्वारा भारत के संविधान के उक्त प्रावधानों के क्रियान्वयन की बात की जा रही हो, ऐसे में ‘‘विधि आयोग’’ देश के न्यायालयों में अंग्रेजी को बनाये रखने की बात कर रहा है। जबकि इसी अंक में न्यायमूर्ति श्री प्रेमशंकर गुप्त के दो आलेख भी प्रकाशित कर रहा हूं जिनसे स्पष्ट होगा कि न्यायालयों में हिन्दी के प्रयोग में कोई बाधा नहीं है। राजभाषा विभाग से अनुरोध है कि वह इस संबंध में देश के सभी उच्च-न्यायालयों, संगठनों एवं देश की जनता का अभिमत प्राप्त करने हेतु पहल करे, ताकि इस देश की जनता को उसकी भाषा में न्याय मिल सके। इस संबंध में ‘‘विधि आयोग की सिफारिश का सच’’ नामक ‘‘विशष आलेख ’’ में मैंने विस्तार से लिखा है। पता नहीं हमारे देश के नागरिकों को उसकी भाषा में न्याय देने में हमारे देश का शीर्ष न्यायालय कब सक्षम हो पायेगा ? यदि ऐसे ही चलता रहा तो विवश होकर इस देश की जनता को भी सड़क पर उतर कर आंदोलन हेतु विवश होना पड़ेगा।

इस बीच यों तो कई हिन्दीभाषी साहित्यकारों का निधन हुआ, लेकिन दो हिन्दीसेवकों का जिक्र करना चाहूँगा, जो कि मुझसे कई वर्षों तक जुड़े रहे। श्री विश्वम्भर प्रसाद गुप्त ‘गुप्त-बन्धु’ जिन्होंने 28 मई, 2009 को अपने शरीर का त्याग किया और दूसरे श्री आनन्दस्वरूप गर्ग जिन्होंने 17 जुलाई, 2009 को अपना शरीर त्यागा। निश्चित ही इन दोनों के राष्ट्रभाषा हिन्दी के प्रति समर्पण को भुलाया नहीं जा सकेगा। ‘अनुरोध’ परिवार की ओर से विनम्र श्रद्धांजलि।

इस बार बस इतना ही.........

आपका,

(दुर्गेश गुप्त ‘‘राज’’)

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हमारा उद्देश्य राष्ट्रभाषा हिन्दी एवं भारतीय भाषाओं की रक्षा एवं देवनागनरी लिपि एवं अन्य भारतीय लिपियों की रक्षा करना है। जरा विचार करें जब भारतीय भाषाएं एवं लिपियां ही नहीं रहेंगी तो इन भाषाओं में लिखे गये साहित्य को कौन पढ़ेगा ? भाषाओं का सम्बन्ध सीधे संस्कृति से जुड़ा होने के कारण जब भाषाएं ही नहीं रहेंगी तो संस्कृति भी धीरे-धीरे विलुप्त हाती जाएगी। अत: भाषा एवं संस्कृति के संरक्षण में आप अपना योगदान किस प्रकार कर सकते हैं, कृपया ई-मेल द्वारा सूचित करें ताकि इनका प्रकाशन इस जाल-स्थल पर किया जा सके।
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