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माह सितम्बर-२००९

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मुख्य समाचार

सपनों की राह में हिंदी की बाधा नहीं

विख्यात वैज्ञानिक डा.अनिल काकोड़कर की हिंछी के प्रति गहरी आस्था यह बताती है कि कैरियर में आगे बढ़ने के लिए भाषा और स्थान की रुकावट नहीं है।

भोपाल। हिंदी माध्यम से पढ़ाई करने वाले छात्रों के लिए पद्म विभूषण डा. अनिल काकोड़कर का वक्तव्य हौसला बढ़ाने वाला साबित हो सकता है। मंगलवार को उन्होंने राष्ट्रपति द्वारा सम्मान प्राप्त करने के पश्यात भास्कर से चर्चा के दौरान कहा था कि ‘जज्बा होतो भाषा आड़े नहीं आती।’

उल्लेखनीय है कि डा. कोकोड़कर म.प्र. के बड़वानी जिले के हैं और उनकी पढ़ाई हिंदी भाषा में हुई है। वे परमाणु ऊर्जा आयोग के अध्यक्ष हैं और उनकी पहचान प्रतिष्ठित वैज्ञानिक के रूप में भी है। देश की सर्वाधिक प्रतिष्ठित सेवाओं में से एक सिविल सेवा की प्रारंभिक परीक्षा का आयोजन होना है। सिटी भास्कर ने शहर में पदस्थ उन आईएएस अधिकारियों से बात की, जिन्होंने न्यूनतम साधनों के साथ हिंदी भाषा माध्यम से पढ़ाई की और आज उनकी कामयाबी युवाओं की प्ररेणास्रोत है।

मनोज श्रीवास्तव (संस्कृत सचिव) : हिंदी में सारी खूबियां

मूलमंत्र: सिविल सेवा के लिऐ दूसरी भाषाओं के मुकाबले हिंदी किसी भी तरह कमजोर नहीं है, बल्कि यह तो शक्ति है, क्योंकि मातृभाषा में ही हम खुद को आसानी से अभिव्यक्त कर पाते हैं। अंग्रेजी समेत दूसरी भाषाओं में भी विशेषज्ञता हासिल करना अच्छी बात है, क्योंकि अधिक से अधिक भाषाओं का ज्ञान हमारे विकास में सहायक होता है, लेकिन यह हिंदी की कीमत पर नहीं होना चाहिए। मैं सिविल सेवा की तैयारी करने वाले युवाओं से कहना चाहता हूं कि अगर उनका माध्यम हिंदी है तो यह किसी भी तरह से उनकी कामयाबी में बाधक नहीं है।

संस्कृति से जुड़ाव: शिव शेखर शुक्ला, भोपाल कलेक्टर

मूलमंत्र: जमीन से जुड़कर ही विकास के पथ पर बढ़ा जा सकता है। हिंदी भविष्य को निखारती है। सुनहरे कल को संवारने में यह कोई बाधा नहीं है, बल्कि इससे तो आत्मविश्वास में वृद्धि होती है। अंग्रेजी आज की आवश्यकता है, इसलिए इसमें भी दक्षता हो पर इसमें कमजोरी को अपनी कमी नहीं मानें। मेरा मानना है कि युवा अपनी संस्कृति से जुड़े रहें और इच्छा शक्ति को मजबूत बनाएं।

भाषा बाधक नहीं: संजय शुक्ला, मध्य विद्युत क्षेत्र वितरण कंपनी के सीएमडी

मूलमंत्र: मेहनत करने वालों के लिए भाषा कोई बाधा नहीं होती। हिंदी तो जीवन की अभिव्यक्ति का माध्यम है, इससे भविष्य को निखारने में कहीं कोई बाधा नहीं आती। हम दूसरी भाषाओं में विशेषज्ञता हासिल कर सकते हैं, लेकिन जितने सहज मातृभाषा में होते हैं, उतनी सहजता दूसरी भाषा में संभव नहीं है। मैं मानता हूं कि युवाओं को केवल लक्ष्य पर नजर जमाए रखना चाहिए।(2 अप्रैल, 09 दै.भास्कर से)

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हमारा उद्देश्य राष्ट्रभाषा हिन्दी एवं भारतीय भाषाओं की रक्षा एवं देवनागनरी लिपि एवं अन्य भारतीय लिपियों की रक्षा करना है। जरा विचार करें जब भारतीय भाषाएं एवं लिपियां ही नहीं रहेंगी तो इन भाषाओं में लिखे गये साहित्य को कौन पढ़ेगा ? भाषाओं का सम्बन्ध सीधे संस्कृति से जुड़ा होने के कारण जब भाषाएं ही नहीं रहेंगी तो संस्कृति भी धीरे-धीरे विलुप्त हाती जाएगी। अत: भाषा एवं संस्कृति के संरक्षण में आप अपना योगदान किस प्रकार कर सकते हैं, कृपया ई-मेल द्वारा सूचित करें ताकि इनका प्रकाशन इस जाल-स्थल पर किया जा सके।
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