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माह अक्तूबर-२००९

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विधि आयोग के इंकार पर शुरू किया अभियान

हिंदी के लिए वकीलों का शंखनाद

नई दिल्ली (एजेंसीं)। टेलीविजन के माध्यम से देश के अधिकतर घरों में हिन्दी के प्रवेश के बावजूद इसे उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालय की भाषा नहीं बनाया जा सका है और विधि आयोग के इंकार के बावजूद इस भेदभाव के खिलाफ दिल्ली के वकीलों के एक समूह ने हिन्दी में बहस करने के विकल्प हेतु अभियान शुरू किया है।

उच्च न्यायालयों में हिन्दी में बहस की अनुमति नहीं मिलने और अंग्रेजी को बढ़ावा देने के खिलाफ वकीलांे के संगठन आल इंडिया लायर्स यूनियन की दिल्ली इकाई ने इसके खिलाफ हस्ताक्षर अभियान शुरू किया और दिल्ली उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश एवं राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के उपराज्यपाल के समक्ष प्रतिवेदन पेश किया है। हालांकि, इससे पहले विधि आयोग ने अपनी रिपोर्ट में उच्च न्यायालय एवं सर्वोच्च न्यायालय में हिन्दी में फैसला सुनाए जाने के लिए संविधान के अनुच्छेद 348 में संशोधन करने की राजभाषा समिति की अनुशंसा को ठुकराते हुए कहा कि राष्ट्रीय परिप्रेक्ष में निर्णय लेने की प्रक्रिया से जुड़े होने के कारण यह व्यवहार्य नहीं है। आल इंडिया लायर्स की दिल्ली इकाई के अध्यक्ष अशोक अग्रवाल ने कहा कि देश में लाखों की संख्या में अदालतों में मामले लंबित हैं जिसका एक प्रमुख कारण वाद का अंग्रेजी भाषा में ठीक तरीके से दर्ज नहीं किया जाना है।

विभिन्न मामलों पर बेहतर समझ बनाने और अच्छी बहस के लिए हिन्दी को अदालतों में स्वीकार किया जाना चाहिए। अग्रवाल ने कहा कि एक वकील को बहस के दौरान सिर्फ इस बात की लिए बहस की अनुमति नहीं दी गई क्योंकि उन्होंने बहस में हिन्दी भाषा का उपयोग किया था। उनसे कहा गया कि अदालत की भाषा अंग्रेजी है। इससे पूर्व विधि आयोग को अपने सुझाव में न्यायमूर्ति एम.एन.वेंकटचलैया ने कहा कि हमें समझना चाहिए कि हिन्दी हमारी राष्ट्रभाषा है और राष्ट्रीय जीवन में हरएक क्षेत्र में हिन्दी को उचित स्थान मिलना चाहिए। इस संबंध में उच्च न्यायालय अपवाद नहीं हो सकता है। बहरहाल, हिन्दी के पक्ष में अभियान चलाने वाले समूह के अध्यक्ष अधिवक्ता अनिल कुमार चैहान ने कहा ‘‘उच्च अदालतों में हिन्दी में बहस की अनुमति प्रदान करने की मांग के समर्थन में हमारे अभियान को जबर्दस्त सहयोग मिल रहा है। इसके तहत अभी तक तीन हजार से अधिक वकील हस्ताक्षर अभियान का हिस्सा बन चुके हैं। उन्होंने कहा कि हमारी मांग है कि हिन्दी सबसे अधिक बोली, समझी और प्रयोग की जाने वाली भाषा है। अत: उच्च अदालतों में हिन्दी में बहस की अनुमति प्रदान की जाना चाहिए। ’’(राज एक्सप्रेस 16 सितम्बर, 2009 से)

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