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माह अक्तूबर-२००९

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संपादकीय

हिंदी-दिवस आया और चला गया

हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी हिंदी-दिवस आया और चला गया। सरकारी विभागों, उपक्रमों, मंत्रालयों की व्यस्तता कुछ बढ़ गई हिंदी के लिये। कहीं हिंदी माह, तो कहीं हिंदी सप्ताह, तो कहीं हिंदी-दिवस के रूप में इसे मनाया गया। राजभाषा के नाम पर हिंदी प्रतियोंगिताओं का आयोजन, नाटकों का मंचन, कवि-सम्मेलन, कवि-गोष्ठियां, हिंदीभाषी साहित्यकारों के सम्मान कार्यक्रमों का आयोजन किया गया। कुछ संस्थानों द्वारा उनके कार्यालयों में स्थान न होने के कारण शहर के मंहगे होटलों में गोष्ठियों का आयोजन किया गया। यानि कि कुछ मिलाकर यों कहिये कि राजभाषा के नाम जो निधि आबंटित हुई थी उसका उपयोग उनके द्वारा किया गया।

यदि गैर सरकारी या सरकारी मदद से चलने वाली साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्थाओं की बात करें, तो उनके द्वारा भी बड़ी ही धूमधाम से हिंदी-दिवस के अवसर पर विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन, हिंदीसेवी संपादकों, पत्रकारों, साहित्यकारों के सम्मान जैसे कार्यक्रमों का आयोजन किया गया। हिंदीसेवियों के सम्मान के लेकर जब देश की जानी-मानी संस्था के प्रमुख से मैंने कहा कि अपनी भाषा के लिये सम्मान की क्या आवश्यकता ? तो उनका कहना था कि हम तो वर्षों से इस प्रकार के आयोजन करते आ रहे हैं, अतः हम तो यह काम करेंगे। इस संबंध में पं.मदनमोहन मालवीय के 1918 में महात्मागांधी को लिखे पत्र के अंश याद आ रहे हैं जिसे महात्मा गांधी जी द्वारा ‘‘हिन्दी साहित्य सम्मेलन, इन्दौर’’ के अपने ‘अध्यक्षीय भाषण’ के दौरान 28 मार्च, 1918 को पढ़ा था, उसमें मालवीय जी द्वारा ऐसे सम्मेलनों के तारतम्य में लिखा था-"भाषा माता के समान है। माता पर हमारा जो प्रेम होना चाहिये वह हम लोगों में नहीं है। वास्तव में मुझे तो ऐसे सम्मेलनों से प्रेम नहीं है। तीन दिन का जलसा होगा। तीन दिन कह सुनकर (आगे) जो करना चाहिये उसे हम भूल जायेंगे। ..." आज भी 91 वर्ष उपरांत भी स्थिति जस की तस है।

आजादी के 62 वर्षों बाद भी हिंदी के प्रचार-प्रसार के नाम पर करोड़ों रुपये का अपव्यय किया जाना क्या समझदारी कही जायेगी। विशेषकर हिंदीभाषी राज्यों में जहां की राजकाज की भाषा हिंदी है, जहां रहने वाले हिंदी को दैनिक व्यवहार में उपयोग करते हों। कम से कम हिंदीभाषी राज्यों में तो इस प्रकार के आयोजन बंद होने ही चाहिये। इन राज्यों में संसदीय राजभाषा समिति की सिफारिशों को कड़ाई से पालन करने के निर्देश दिये जाने चाहिये।

इस संबंध में नई दुनिया के प्रधान संपादक श्री आलोक मेहता की हिंदी दिवस के अवसर पर प्रकाशित ‘विशेष टिप्पणी’ ‘हिंदी दिवस के विरुद्ध’ से सहमत होते हुये उस आलेख का प्रकाशन इस अंक में कर रहा हूँ। मेहता जी का कहना है कि ‘‘मैं हिंदी दिवस मनाने के बिलकुल विरुद्ध हूं। जिस तरह माता-पिता, देवी-देवता, खुदा, यीशु को हर दिन याद किया जाना चाहिए, उसी तरह भारत में साल के हर दिन राष्ट्रभाषा हिंदी को याद रखते हुए उसकी रक्षा के लिए सोचा जाना चाहिए।’’

पिछले अंक में हमने राष्ट्रीय विधि आयोग की सिफारिश की सच्चाई आपको बताई थी। इस बीच एक सुखद समाचार मिला कि विधि आयोग द्वारा उच्चतम न्यायालय एवं उच्च न्यायालयों में अंग्रेजी बनाये रखने की सिफारिश के विरुद्ध दिल्ली के वकीलों द्वारा उच्च न्यायालयों में हिन्दी में बहस की अनुमति दिये जाने हेतु हस्ताक्षर अभियान छेड़ दिया गया है। यह एक अच्छी पहल है अन्य हिन्दीभाषी राज्यों को भी इसका अनुसरण करना चाहिये, तभी हम इस देश की जनता को उसकी अपनी भाषा में न्याय दिला सकेंगे।

कई वरिष्ठ हिन्दीसेवी एवं साहित्यकार एकजुट होकर आंदोलन की बात करते हैं, लेकिन प्रश्न उत्पन्न होता है कि नेतृत्व कौन करे ? कोई कहता है कि आंदोलन हमारी संस्था के उद्देश्य में नहीं है। कोई कहता है इससे कुछ नहीं होने वाला। दिल्ली की एक संस्था ने कुछ वर्ष पूर्व हरिद्वार में एक बैठक आयोजित की थी। उसमें देशभर से करीब साठ संस्थाओं के प्रतिनिधि सम्मिलित हुये थे। वहां भी जब एकजुट होकर कार्यक्रम बनाने की बात आई तो एक नई संस्था ने जन्म ले लिया। कार्यक्रम की रूपरेखा भी बनाई गई, लेकिन परिणाम शून्य ही रहा।

इस संबंध में मेरा सुझाव है कि जब तक हम संसदीय राजभाषा समिति की राष्ट्रपति द्वारा स्वीकार की गई सिफारिशों को लागू कराने हेतु सक्रिय पहल/आंदोलन नहीं करेंगे तब तक शासकीय कार्यों में हिन्दी की स्थिति में कोई परिवर्तन आने वाला नहीं है। इसके लिये हमें एकजुट होकर पहल करनी ही होगी। इसका एक रास्ता यह हो सकता है कि प्रत्येक संस्था उन सिफारिशों में से एक या अधिक सिफारिशों का चुनाव कर उसके लिये अपने-अपने स्तर पर पहल प्रारंभ करे और अपनी गतिविधियों/पत्राचार की जानकारी अन्य सभी संस्थाओं को दे या उन स्वीकृत सिफारिशों में से महत्वपूर्ण सिफारिशों का चुनाव कर सभी संस्थाएं एकजुट होकर एक कार्यक्रम बनाकर क्रमबद्ध तरीके से एक-एक सिफारिश अमल में लाने हेतु सरकार पर या तत्संबंधी विभाग पर दबाव बनायें। मैं समझता हूं इस प्रकार के कार्यक्रम से किसी भी संस्था का उद्देश्य प्रभावित नहीं होगा और सभी का अस्तित्व भी बना रहेगा, किसी नई संस्था की आवश्यकता भी नहीं पड़ेगी। जहां तक आंदोलन का प्रश्न है उसकी भूमिका तैयार करने की कार्रवाई भी पृथक से जा रही है। इसके लिये एक संस्था द्वारा ‘‘भारतीय भाषा स्वतंत्रता सेना’’ के गठन की कार्रवाई प्रारंभ कर दी गई है। इस संबंध में एवं मैदानी आंदोलन को लेकर हिंदीसेवी एवं साहित्यकार क्या कहते हैं, विस्तार से अगले अंक में चर्चा करूंगा।

इस बार इतना ही............

-दुर्गेश गुप्त ‘‘राज’’

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