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माह सितम्बर-२००९

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विषेश आलेख

अदालती कामकाज में पूरी तरह सक्षम है हिंदी भाषा

न्यायमूर्ति श्री प्रेमशंकर गुप्त

न्यायालयों में हिन्दी के प्रयोग-पथ पर चलने में प्रति पग पर कठिनाईयां तो आती रही हैं परन्तु कोई भी बाधा ऐसी नहीं है जो इस पथ पर अग्रसित हो रहे राहियों का मार्ग अवरुद्ध कर दे। यह अवश्य है कि इस कंटकाकीर्ण मार्ग को साफ-सथुरा करना है जिससे न केवल इस पथ पर चल रहे पथिकों को मंजिल सुलभ हो जाये वरन् यह बीथिका इतनी सुरम्य और आकर्षक हो जाये कि बरबस ही बटुकों का चित अपनी ओर खींचने लगे।

यद्यपि मेरा विद्यार्थी जीवन में न्यायालयों से किसी प्रकार का संबंध अथवा लगाव नहीं था परन्तु उन दिनों इडियन प्रेस इलाहाबाद से प्रकाशित साप्ताहिक ‘देशदूत‘ में प्रायः न्यायालयों के भाषा-विवाद संबंधी लेखों को पढ़कर ऐसा अनुभव करने लगा था कि जन सामान्य को न्यायालयों की कार्यवाहियों की जानकारी होने से जानबूझकर दूर रखने की चेष्टा की जाती है। लेकिन क्यों? यह तब नहीं समझ पाता था।

जब आज के अनेक वर्ष पूर्व जिले में वकालत के व्यवसाय में आया तो भाषा-संबंधी एक नई समस्या सामने आई। सारा पठन-पाठन मुख्यतः अंग्रेजी में हुआ था। मातृभाषा के नाते हिन्दी से लगाव था। परन्तु जब अपने सीनियर के चेम्बर में प्रशिक्षण के लिए गया तो सारी मिसिलें उर्दू में पाईं। स्वयं कभी उर्दू के अध्ययन का सौभाग्य नहीं मिला था। बूढ़े मुंशीजी की सहायता से समझने की कोशिश करने लगा और 6 माह में इतनी तो उर्दू आ ही गई कि प्लीडरशिप का सर्टीफिकेट हासिल करने के लिए मजिस्ट्रेट के इजलास में इमला लिखने में सफल हो कर उनसे उर्दू जानने का प्रमाण पत्र पा सका।

जिला न्यायालयों में भाषा की अजब समस्या थी। इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से नया-नया निकलने के कारण और क्रिश्चियन कालेज की शिक्षा की पृष्ठभूमि होने के कारण गर्व से मुंह चबाकर अंग्रेजी बोलता तो कानूनगों से पदोन्नत हुए डिप्टी साहब के पल्ले कुछ न पड़ता और जूनियर वकील होने के कारण जज साहब के इजलास में ले ही कौन जाता। लेकिन यह देखकर छटपटाहट होती कि दूसरे प्रदेश से आए हुए एडवोकेट महोदय केवल लच्छेदार अंग्रेजी के सहारे ही सेशन जज के न्यायालय में अपनी वकालत की जड़ें जमाए हुए हैं और आम मुवक्किलों पर केवल अंग्रेजी की वजह से अपना रौब गालिब कर रखा है।

धीरे-धीरे हिन्दी, उर्दू, अंग्रेजी जहां जैसी बन गई प्रयोग करके वकालत के जीवनपथ पर अग्रसित होता रहा। वकालत में खासतौर से प्रारम्भिक काल में न्यायालयों को अपनी बात समझने के लिए वकीलों को देखना पड़ता है कि न्यायालय की सुविधा और रुचिवाली भाषा का ही वे प्रयोग करें। अतः न्यायालय में कौन-सी भाषा प्रचलित हो इसमें विचारपतियों का बहुत बड़ा हाथ होता है। जिस भाषा के प्रयोग के लिए उनकी ओर से संकेत होता है उसी भाषा को न्यायालय में प्रचलन में प्रोत्साहन और प्राथमिकता मिलती है। इस कारण यह और भी आवश्यक है कि हिन्दी के प्रचलन के लिए विचारपतियों की ओर से समुचित प्रोत्साहन दिया जाये।

जिले में शासकीय अधिवक्ता के रूप में कार्य करने पर यह इच्छा बलवती हुई कि हिन्दी का अधिकाधिक प्रयोग किया जाये। उन दिनों लगभग पन्द्रह वर्ष पूर्व सत्र न्यायालयों में यद्यपि कार्य हिन्दी में होने लगा था परन्तु बहुत से विचारपति अपनी पुरानी अभ्यस्तता एवं सुविधा के कारण हिन्दी में कार्य करने में न केवल अरुचि रखते थे बल्कि हतोत्साहित करते थे। यह निश्चय किया कि अपनी ओर से कोई भी आवेदन-पत्र अंग्रेजी में नहीं दूंगा। जिला जज महोदय जिनके न्यायालय में अधिकतर कार्य करना पड़ता था, अंग्रेजी से मोहग्रस्त थे। उन्होंने मेरे इस कार्य को दिल से नापसंद किया परन्तु मैंने तब तक हिन्दी की लहर की ओर आकर्षित करने की प्रत्येक संभव चेष्टा की और यह उनकी सहृदयता थी कि कुछ ही महीनों में वह हिन्दी भाषी न होते हुए भी हिन्दी में आवेदन-पत्रों पर आदेश लिखाने लगे। उन्हें यह अनुभव हुआ कि न्यायालयों का दैनिक कार्य हिन्दी में सुचारु रूप से चल सकता है और हिन्दी की क्षमता के बारे में उनकी संदिग्धता दूर होती गई।

यह एक भ्रान्ति है कि हिन्दी न्यायालयों के कार्य के लिए सक्षम भाषा नहीं है और यह भ्रांति तभी मिटती है जब हिन्दी में कार्य किया जाने लगता है। यदि न्यायाधीष हिन्दी में कार्य करने की आदत डालने लगें तो उनकी तथाकथित असुविधा और अनुख शनै-शनैः दूर होने लगता है और उनमें विश्वास जाग्रत हो जाता है। हां, हठवादिता की बात दूसरी है। सात वर्ष पूर्व जब उच्च न्यायालय में उप-शासकीय अधिवक्ता के रूप में नियुक्त होकर आया तो पहले ही दिवस एक खंडपीठ में मृत्युदण्ड की अपील में राज्य की ओर से बहस करने गया। अपीलार्थी की बहस के पश्चात् जब मैं खड़ा हुआ तो माननीय न्यायमूर्तियों से हिन्दी में बहस करने की अनुमति चाही। तब तक यद्यपि फौजदारी अपीलों में कभी-कभी हिन्दी में बहस हो जाती थी परन्तु न्यायालय उसे प्रशंसात्मक अथवा स्वीकारात्मक रूप में नहीं लेते थे। मेरे अनुरोध को सुनकर वरिष्ट न्यायमूर्ति ने मुझे यद्यपि हिन्दी में बहस करने की अनुमति दे दी परन्तु हिन्दी में अभिव्यक्ति की सक्षमता के बारे में अपना संदेह प्रकट किया और ‘खिचड़ी भाषा‘ प्रयोग करने की वर्जना कर दी। बड़ी कठिन परीक्षा की घड़ी आ पड़ी। छात्रावास की परिचयरात्रि की भांति उच्च न्यायालय में बहस करने का पहला दिन, न्यायमूर्ति की इस गंभीर चेतावनी के बाद चारों ओर से वक्र मुस्कराहट से घूरते हुए नए चेहरे, लेकिन हृदय में अपने-आप आत्म-विश्वास जाग्रत हो गया और मैंने जननी हिन्दी का आंचल मां शारदा का सुमिरन कर थाम लिया। दिन भर बहस सुनने के पश्चात् जब विद्वान न्यायमूर्ति ने स्नेह से कहा कि हिन्दी में भी न्यायालयों में अभिव्यक्ति हो सकती है तो कहीं जान में जान आई और यह विश्वास दृढ़ हुआ कि उच्च न्यायालय में भी हिन्दी में अपनी बात कही और समझाई जा सकती है। यदि वकील वर्ग उच्च न्यायालयों में अपनी बहस हिन्दी में करने में दृढ़ता से लग जाये तो कोई कारण नहीं कि उच्च न्यायालय में भी हिन्दी को अपना उचित स्थान न मिल सके। (साभारः हिन्दी जगत एवं प्रभासाक्षी)

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