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माह सितम्बर-२००९

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विषेश आलेख

हिंदी में अदालती कार्यवाही के सफल प्रयोग

न्यायमूर्ति श्री प्रेमशंकर गुप्त

उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में जब राष्ट्रसेवा करने का अवसर प्रभु-कृपा से प्राप्त हुआ तो मैंने अपने शपथ ग्रहण समारोह के अवसर पर मातृभाषा के प्रयोग के लिए साग्रह याचना करते हुए कहा था-

‘न्याय मंदिर का द्वार प्रत्येक वर्ग के लोगों के लिए खुला हुआ है। हमारे देश एवं प्रदेश में शिक्षा का प्रसार होने के पश्चात् भी अनपढ़ों की संख्या अत्यधिक है अथवा पढ़े-लिखे लोगों में भी अधिकतम संख्या उन लोगों की है जो केवल अपनी मातृभाषा ही लिख-पढ़ व समझ सकते हैं। यह एक विडम्बना है कि जनता को न्याय जन-भाषा में नहीं मिलता है, यद्यपि संविधान में प्रारम्भ से ही यह व्यवस्था संजोयी गई कि जन न्यायालय की भाषा जन-भाषा ही रहेगी परन्तु लगभग तीस वर्षों में एक पूरी पीढ़ी बीत जाने पर उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाने वाला वादकारी स्वयं नहीं समझ पाता है कि उसके भाग्य का निर्णय ‘क्या‘ और ‘क्यों‘ हुआ!

‘आज भी उच्च न्यायालय में अंग्रेजी का बोलबाला है और कदाचित् अंग्रेजी का प्रयोग समाज में एक विशिष्ट प्रकार का वर्गभेद स्थापित करता चला जा रहा है। यदि हम चाहते हैं कि जनता को न्याय सुलभता और सरलता से मिल सके और उसके प्राप्त करने में दुरुहता को तिलांजलि दी जाये तो यह आवश्यक हो गया है कि उच्च न्यायालय स्तर पर भी हिन्दी का अधिकाधिक प्रचलन किया जाये। हमें अंग्रेजी से कोई विरोध नहीं है, हम बड़ी कृतज्ञता से उसके द्वारा दिए गए विचारों, भावों और मीमांसाओं को ग्रहण करने के लिए प्रस्तुत हैं। परन्तु यह भी अक्षुण्ण सत्य है कि जब तक हिन्दी एवं प्रादेशिक भाषाओं का न्यायालयों में समुचित प्रयोग नहीं किया जायेगा तब तक न्याय जन-जन को सुलभ नहीं होगा वरन् वह चन्द व्यक्तियों की मुट्ठी के अंदर बंद रह जायेगा और देश की सामान्य जनता को उनके विवेक, बुद्धि एवं दया पर आश्रित होकर रह जाना पड़ेगा।

‘यदि इस मानसिक दासता से जन-साधारण को मुक्त करना है तो अभिभाषकों एवं न्यायाधीशों का यह पवित्र कर्तव्य हो जाता है कि हिन्दी अथवा प्रादेषिक भाषा का उच्च न्यायालय में भी यथासंभव अधिकाधिक प्रयोग करें। कदाचित् प्रारम्भ में हम सभी को ऐसा करने में अटपटा लगे परन्तु अन्ततोगत्वा मातृभाषा का प्रयोग करके ही हम जनता जनार्दन की वास्तविक सेवा कर सकेंगे। इस पावन कार्य को करने के लिए मैं आप सभी से अधिकाधिक सहयोग करने की साग्रह याचना करता हूं।‘

पूर्व मुख्य न्यायमूर्ति श्री अस्थाना ने जब मीसा वाला निर्णय हिन्दी में दिया था जिसे मुझे पढ़ने का सौभाग्य उसी दिन प्राप्त हुआ था, मैंने खुले न्यायालय में उनके प्रति हिन्दी भाषा-भाषियों की ओर से कृतज्ञता-ज्ञापन किया था। तब से मैं आश्वस्त हो गया था कि उच्च न्यायालय में भी निर्णय हिन्दी में दिए जा सकते हैं। और यह निर्णय मेरी प्रेरणा का स्रोत बन गया था। उच्च न्यायालय में न्यायाधीश का पद-भार ग्रहण करने के एक सप्ताह पश्चात् मुझे प्रथम बार जब एकल पीठ में बैठने का अवसर मिला तो मैंने हिन्दी में न्यायालय की सम्पूर्ण कार्यवाही करने का प्रयास किया। स्वयं सारे आदेश हिन्दी में लिखाए पीठ सचिव ने भी हिन्दी में ही मुकदमों को बुलाया व आदेश लिखे एवं विद्वान अधिवक्ताओं ने तर्क भी हिन्दी में प्रस्तुत किए।

कुछ अधिवक्ताओं ने तो स्वतः हिन्दी में बहस की और कुछ जो संकोच कर रहे थे उन्होंने अनुरोध पर हिन्दी में बहस की। इस बात की खुली छूट थी कि बहस में अंग्रेजी, उर्दू, संस्कृत, फारसी जो भी शब्द प्रयोग करना चाहें करें। मैंने पाया कि बहुतों ने हिन्दी में बहुत अच्छी बहस की। शेष लोगों में भी हिन्दी के प्रति उत्साह था। मैंने यह अनुभव किया कि लोग अधिक संस्कृतनिष्ठ भाषा से अनभिज्ञ होने के कारण अभी सरल हिन्दी के प्रयोग को ही प्राथमिकता देना चाहते हैं। मेरा मत है कि लोगों के मनों से इन निर्मूल शंका को समाप्त करा देना चाहिए कि हिन्दी के मायने केवल संस्कृतनिष्ठ हिन्दी ही नहीं है वरन् वह सीधी-सादी भाषा है जिसका प्रयोग हम प्रतिदिन करते हैं और जो सबको बोधगम्य है। ऐसी भाषा का प्रयोग करने के लिए अधिकतर लोग उच्च न्यायालय में प्रस्तुत प्रतीत होते हैं। एकल न्यायपीठ में जब भी मैं बैठता हूं वहां सुने हुए मुकदमों के निर्णय भी हिन्दी में ही लिखाता हूं।

इस संबंध में कुछ व्यावहारिक कठिनाइयां मेरे सामने आ रही हैं जिनके निवारण की आवश्यकता है।

उच्च न्यायालय में हिन्दी के आशुलिपिक अभी तक उपलब्ध नहीं हैं। जो हिन्दी जानते भी हैं वे चूंकि अंग्रेजी में सहूलियत से कार्य करते रहे हैं इसलिए हिन्दी में काम नहीं करना चाहते। इस संबंध में ठोस कार्यवाही करने की आवशयकता है। इन आशुलिपिकों में से कनिष्ठ वर्ग को हिन्दी आशुलिपि सीखने का अवसर दिया जाये और कुछ मासों का समय निर्धारित कर दिया जाये, तब तक वे अनिवार्यतः हिन्दी आशुलिपि सीख लें और काम करने लगे।

उच्च न्यायालय में आशुलिपिकों की नियुक्ति होने जा रही है, उसमें हिन्दी आशुलिपि जानना अनिवार्य कर दिया जाये और प्राथमिकता उन्हीं को दी जाये जो हिन्दी-अंग्रेजी दोनों ही आषुलिपि जानते हों।

एक दूसरी सबसे बड़ी कठिनाई राज्यभाषा अधिनियमों के प्रावधानों के अनुसार हिन्दी में दिए गत निर्णयों के प्राधिकृत अनुवाद रखने की है। हिन्दी के निर्णय इकट्ठे होते जा रहे हैं। अभी तक उनके प्राधिकृत अनुवाद नहीं हुए हैं। उच्च न्यायालय का अनुवाद विभाग बहुत पहले ही टूट चुका है और प्राधिकृत अनुवाद कराना एक समस्या हो गई है।

अतएव अधिनियम में इस संबंध में शीघ्र ही यथोचित संशोधन आवश्यक है जिससे अनुवाद की यह अर्थ-विहीन अनिवार्यता समाप्त कर दी जाये। हां वे निर्णय जिनकी अपील उच्चतम न्यायालय में जानी है, के प्राधिकृत अनुवाद करवा लिए जाया करें ताकि वहां कठिनाई न हो।

हिन्दी का व्यवहार रूप में प्रयोग करने में मुझे जो भी खट्टे-मीठे अनुभव हुए मैंने इस उद्देष्य से आपके समझ रखे हैं कि उनका निराकरण करने के लिए हम उचित समाधान ढूंढ सकें। (साभारः हिन्दी जगत एवं प्रभासाक्षी)

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