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माह सितम्बर-२००९

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विषेश आलेख

‘‘भारतीय विधि आयोग’’ द्वारा उच्चतम न्यायालय में अंग्रेजी बनाये रखने की सिफारिश की

‘‘आयोग की सिफारिश का सच’’

दुर्गेश गुप्त ‘‘राज’’

भारत सरकार, राजभाषा विभाग, गृह मंत्रालय, दिल्ली द्वारा राजभाषा अधिनियम, 1963 की धारा 4(1) के अधीन सन् 1976 में गठित संसदीय राजभाषा समिति के सातवें खंड की सिफारिशों को राष्ट्रपति जी के समक्ष प्रस्तुत किया गया था। उक्त खण्ड में समिति द्वारा सरकारी कामकाज में राजभाषा के प्रयोग हेतु प्रचार-प्रसार, सरकारी कामकाज में प्रशासनिक और वित्तीय कार्यों से जुड़े प्रकाशनों की हिंदी में उपलब्धता, राज्यों में राजभाषा हिंदी की स्थिति, वैश्वीकरण और हिंदी, कंप्यूटरीकरण एक चुनौती से संबंधित सिफारिशें की गई थीं। राजभाषा अधिनियम, 1963 की धारा 4(3) के अनुसार इसे लोक सभा तथा राज्य सभा के पटल पर भी रखा गया था।

उक्त सिफारिशों की प्रतियां भारत सरकार के मंत्रालय/विभागों तथा राज्यों/संघ राज्य क्षेत्रों की सरकारों को भेजी गई थीं। इस संबंध में विभिन्न मंत्रालयों/विभागों तथा राज्यों/संघ राज्य क्षेत्रों की सरकारों से प्राप्त मत पर विचार करने बाद समिति द्वारा की गई अधिकांश सिफारिशों को मूल रूप में या कुछ संशोधनों के साथ स्वीकार करने का निर्णय लिया गया एवं दिनांक 13 जुलाई, 2008 के संकल्प द्वारा राष्ट्रपति जी के आदेश उपरांत यह सिफारिशें एवं उन पर लिये गये निर्णय राजपत्र में प्रकाशित किये गये।

इस खण्ड की अन्य सिफारिशों पर चर्चा न कर यहाँ केवल उच्चतम न्यायालय/उच्च न्यायालय से संबंधित सिफारिश क्रमांक 16.8(घ) एवं 16(च) की चर्चा करना चाहूँगा। उक्त सिफारिशें एवं निर्णय निम्नानुसार थे-

‘‘कंडिका क्र. 16.8(घ) : संविधान के अनुच्छेद 348 में संशोधन किया जाए ताकि विधायी विभाग मूल प्रारूपण का कार्य हिंदी में कर सके।

कंडिका क्र. 16.8(च):संविधान के अनुच्छेद 348 में संशोधन के उपरांत उच्च न्यायालयों/उच्चतम न्यायालय से कहा जाए कि वे निर्णय और डिक्री आदि हिंदी में देना प्रारंभ करें ताकि ऐसे अनेक विभाग जो न्यायिक/अर्धन्यायिक स्वरूप के कार्य कर रहे हैं, न्याय-निर्णयन हिंदी में कर सकें। इस समय ऐसे विभाग न्याय-निर्णयन हिंदी मंे पारित करने में इसलिए असमर्थ हैं क्योंकि उच्च न्यायालयों/उच्चतम में उनके निर्णयों के विरुद्ध की जाने वाली अपील अंग्रेजी में होती है।

सिफारिश (घ) और (च): ये दोनों संस्तुतियां विधायी विभाग को इस निर्देश के साथ भेज दी जाए कि वे इन पर भारतीय विधि आयोग की सलाह लेकर अपनी संविचारित टिप्पणी से अवगत कराएं। तद्नुसार ही अंतिम निर्णय लिया जाएगा।’’

उक्त सिफारिशों की प्रति विधि एवं विधायी मंत्रालय द्वारा 29 मार्च, 2006 को भारतीय विधि आयोग को उनके अभिमत हेतु अग्रेषित की गई। इन सिफारिशों के संबंध में डा. जस्टिस ए.आर. लक्षमणन, पूर्व जस्टिस, उच्चतम न्यायालय एवं भारत के विधि आयोग के चेअरमेन द्वारा डा. एच.आर. भारद्वाज, विधि एवं विधायी मंत्री, भारत सरकार को एक पत्र दिनांक 17 दिसम्बर, 2008 को प्रेषित कर विधि आयोग के अभिमत से उन्हें अवगत कराया गया, जिसमें उच्चतम न्यायालय एवं उच्च न्यायालयों में अंग्रेजी के प्रभुत्व को बनाये रखने की पुरजोर सिफारिश की गई है। ऐसा प्रतीत होता है कि अभिमत देते समय भारतीय विधि आयोग द्वारा भारत के संविधान की मूल भावनाओं पर ध्यान ही नहीं दिया, जो कि भारत की जनता के लिये बनाया गया था।

संक्षेप में जनसाधारण की जानकारी हेतु भारतीय विधि आयोग द्वारा अपना अभिमत जिस आधार पर तैयार किया गया, उसका विवरण प्रस्तुत किया जा रहा है। उक्त पत्र में माननीय न्यायमूर्ति महोदय द्वारा लेख किया गया है कि विधि आयोग द्वारा भारत के उच्चतम न्यायालय के कुछ सेवा निवृत्त न्यायमूर्तियों एवं न्यायाधीशों, भारत के विभिन्न भागों में निवासरत वरिष्ठ अधिवक्ताओं एवं विभिन्न राज्यों की बार एसोसियेशन को भारत के संविधान की कंडिका 348 में संशोधन संबंधित राजभाषा विभाग की अनुसंशाओं संबंधी पत्र प्रेषित किया गया।

विधि आयोग की ये सिफारिशें उनके द्वारा 216वें प्रतिवेदन के रूप में दिनांक 17 दिसम्बर, 2008 में अंग्रेजी में प्रस्तुत की गई। छिहत्तर पृष्ठों के इस प्रतिवेदन के तीसरे भाग में उन सेवा निवृत्त न्यायमूर्तियों/न्यायाधीशों, वरिष्ठ अभिभाषकों एवं बार ऐसोसियेशन के अभिमतों का समावेश है जिन्हें विधि आयोग द्वारा पत्र प्रेषित किये गये थे। इनमें प्रायः सभी अहिन्दी भाषी क्षेत्रों से संबंध रखते हैं। जो कि निम्नानुसार है:-

सेवा निवृत्त न्यायमूर्ति श्री व्हाय.वी. चन्द्रचूढ़, न्यायमूर्ति श्री एस.नटराजन, न्यायमूर्ति श्री के.टी. थामस, न्यायमूर्ति श्री व्ही.आर. कृष्णा ऎयर, न्यायमूर्ति बी.एन. श्रीकृष्णा, न्यायमूर्ति श्री एम.एन. वैंकटचलैया, न्यायमूर्ति श्री के. जगन्नाथ शेट्टी, न्यायमूर्ति बी.पी. जीवन रेड्डी, न्यायमूर्ति ए.एम. अहमदी, न्यायमूर्ति एन. संतोष हेगडे, न्यायमूर्ति एस.एस.एम. कुर्रेशी, न्यायमूर्ति श्री के.एस. परिपूर्णन एवं न्यायमूर्ति श्री व्ही.एस. मलिमाथ सम्मिलित है।

वरिष्ठ अभिभाषकों में सर्व श्री पी.पी. राव, टी.एल. विश्वनाथ ऎयर, विजय हंसारिया, के.के. वेणुगोपाल, अरविन्द दातार, सी. लक्ष्मी नारायणन, डा. आर.जी. पाडिया एवं टी.पी. केलु नाम्बियार सम्मिलित है। इसी प्रकार भारत की बार एसोसियेशन के अध्यक्ष श्री फाली एस. नरिमन को भी सम्मिलित किया गया है, इनके अतिरिक्त ए.पी. हाई कोर्ट एडवोकेट्स एसोसियेशन, हैदराबाद, केरला हाई कोर्ट एडवोकेट्स एसोसियेशन एवं बार काॅसिल आफ तमिलनाडु एवं पुडुचेरी केअभिमत प्राप्त किये गये हैं। विस्तृत प्रतिवेदन विधि आयोग की वेवसाइट http://www.lawcommissionofindia.nic.in पर पढ़ा जा सकता है।

उपरोक्त सेवानिवृत्त न्यायमूर्तियों, वरिष्ठ अभिभाषकों एवं एडवोकेट एसोसियेशन के अभिमत को क्या देश के विभिन्न हिस्सों के न्यायमूर्तियों, वरिष्ठ अभिभाषकों एवं एसोसियेशन का निर्णय माना जा सकता है ? विचारणीय है। ऐसा लगता है कि विधि आयोग द्वारा भारत के संविधान की मूल भावना को दृष्टि में नहीं रखा गया। यदि रखा होता तो वह देश के सभी प्रदेशों के न्यायमूर्तियों, वरिष्ठ अभिभाषकों, बार एसोसियेशन एवं सबसे महत्वपूर्ण वर्ग इस देश के नागरिकों के अभिमत को ध्यान में रखकर अपना अभिमत देता।

इधर पड़ौसी देश नेपाल में वहां के उपराष्ट्रपति द्वारा हिन्दी में शपथ लिये जाने के कारण उनकी शपथ को वहां के सर्वोच्च न्यायालय अवैधानिक करार दे दिया गया है और उन पर वहां की राजभाषा नेपाली में शपथ लेने का दबाव बनाया जा रहा है। उनके द्वारा इसका विरोध करने पर वहां के एक संगठन द्वारा उपराष्ट्रपति जी को हत्या तक की धमकी दे दी गई है। और दूसरी ओर हमारे यहाँ संविधान में राजभाषा हिन्दी स्वीकार किये जाने के उनसठ वर्षों उपरांत भी हमारे न्यायालय उसे स्वीकार करने में हिचकिचा रहे हैं। क्या हमारे देश की जनता को उसकी भाषा में न्याय मिल सकेगा ? विधि आयोग की सिफारिश से ऐसा प्रतीत होता है कि वह देश के शीर्ष न्यायालयों में अंग्रेजी के वर्चस्व को ही बनाये रखना चाहता है। क्या विधि आयोग द्वारा अपनाई गई उपरोक्त प्रक्रिया युक्तिसंगत है, विचारणीय है।

वैसे तो भारत के संविधान के प्रावधानों के तहत गठित राजभाषा समिति स्वयं सक्षम है कि वह इन सिफारिशों को किस दृष्टि से देखती है, लेकिन मेरा एक नागरिक की हैसियत से अनुरोध है कि वह देश की जनता का अभिमत प्राप्त कर इस बिन्दु पर गंभीरता से अपना निर्णय ले, और राजभाषा हिन्दी को शीघ्रातिशीघ्र न्यायालय की भाषा बनाए, ताकि इस देश के नागरिकों को उसकी भाषा में न्याय मिल सके।

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