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माह अक्तूबर-२००९

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विशेष आलेख

पिछड़ेपन की भाषा बनने को अभिशप्त नहीं हिंदी

-बालेन्दु शर्मा दाधीच

हिंदी की यात्रा सफलता और नाकामी के कई विरोधाभासी अर्धविरामों एवं अल्पविरामों से आगे बढ़ती हुई अपनी मौजूदा स्थिति तक आ पहुंची है। यात्रा अभी जारी है और मंजिल अभी दूर। एक क्षेत्र में कुछ कदम आगे बढ़ना और दूसरे में कुछ कदम पीछे हट जाना ही पिछले छह दशकों में हिंदी की विकास यात्रा का फलित है। कुछ विद्वानों ने हाल के वर्षों में अंग्रेजी के सांस्कृंतिक-सामाजिक प्रभुत्व को लेकर गंभीर चिंता प्रकट की हैं। उनकी चिंता अनावश्यक नहीं है। उसे लेकर सतर्क होने की जरूरत है। लेकिन यह मानने का कोई बड़ा कारण नजर नहीं आता कि आने वाले पच्चीस या पचास साल में हिंदी दूसरे दर्जे से भी गिरकर तीसरे दर्जे की भाषा बन जाएगी और उसकी प्रशासनिक एवं सामाजिक शक्ति पंगु हो जाएगी।

जिस तरह देश के छोटे से छोटे गांव-कस्बे में अंग्रेजी सिखाने वाले विद्यालय खुल रहे हैं, जिस तरह आम भारतीय के मन में अपने बच्चों को अंग्रेजी की शिक्षा देने की ललक पैदा हो रही है और जिस तरह अंग्रेजी में प्रवीण गिने-चुने लोगों के लिए रोजगार के अवसर निरंतर बेहतर होते चले जा रहे हैं उसमें एक किस्म का ट्रेंड दिखाई देता है। लेकिन हिंदी से अंग्रेजी की ओर जाने का यह ट्रेंड क्या इतना बड़ा और प्रभावी है कि वह हमारी राजभाषा के लिए खतरा बन जाए? आर्थिक दृष्टि से सक्षम अधिकाश लोग अपने बच्चों को अंग्रेजी स्कूलों और अंग्रेजीदां महाविद्यालयों में भेज रहे हैं। क्या यह सिलसिला हिंदी को निरंतर कमजोर करने और ऐसी भाषा बना देने में परिणित हो जाएगा कि वह समाज के कमजोर तबके की भाषा भर बनकर रह जाए? उसमें साहित्यिक या सांस्कृतिक विमर्श की संभावना नगण्य हो जाए? या फिर उसके माध्यम से रोजगार प्राप्त करने की कोई उम्मीद बाकी न रहे? ऐसा सोचना संभवतः अंग्रेजी की चुनौती को (जिसके अस्तित्व से बिल्कुल भी इंकार नहीं है) कुछ ज्यादा ही डरावने रूप में देखने जैसा होगा।

कहीं आगे, कहीं जड़वत्

हिंदी भले ही आज भी समग्र-भारत की भाषा न बन सकी हो और रोजगार, व्यवसाय एवं प्रबंधन के क्षेत्र में बड़ी सफलताएं प्राप्त न कर सकी हो लेकिन वह पिछड़ेपन से जुड़ी हुई भाषा के रूप में नहीं देखी जा सकती। तकनीक, दूरसंचार, मीडिया और सिनेमा जैसे क्षेत्रों में उसकी सफलताएं निर्विवाद है तो आम लोगों से जुड़ी सेवाओं में उसकी उपयोगिता स्वयंसिद्ध। किंतु शिक्षा और रोजगार के क्षेत्रों में हिंदी की प्रगति बहुत अच्छी नहीं है। तकनीकी दक्षता और व्यावसायिक प्रबंधन वाले क्षेत्रों में भी वह अंग्रेजी से काफी पीछे है। हिंदी साहित्य की गुणवत्ता और स्तरीय साहित्य की लोकप्रियता में भी क्षरण हुआ है। श्रेष्ठतम हिंदी साहित्य की रचना करने वाले अनेक महान साहित्यकारों का देहांत हो चुका है और कुछ जीवन के उत्तरार्ध में हैं। उनका स्थान लेने योग्य कितने साहित्यकार हम पैदा कर सके हैं, इस पर गंभीर विवेचना किए जाने की जरूरत है। शब्द सामर्थ्य के लिहाज से भी हिंदी कोई बहुत छलांगें नहीं मार रही। निराशा के पहलू अभी बाकी हैं।

लेकिन सब कुछ निराशाजनक और नकारात्मक ही हो, ऐसा नहीं है। दस प्रमुख क्षेत्रों में पिछले दो दशकों के दौरान हिंदी का नफा-नुकसान आंका जाए तो पाएंगे कि हिंदी पीछे नहीं हटी, आगे ही बढ़ी है। कुछ अन्य क्षेत्रों में यथास्थिति कायम है। उसकी बाधा दौड़ क¨ निरंतर मुश्किल बनाने की प्रक्रिया आज भी खत्म नहीं हुई है लेकिन अपनी आंतरिक क्षमताओं, विषेषताओं और आम लोगों की शक्ति के समन्वय से वह आगे बढ़ रही है। अगर इस प्रक्रिया में सरकारी समर्थन भी होता तो शायद आजादी के छह दशक बाद हम इस मुद्दे पर चर्चा नहीं कर रहे होते।

जो एक क्षेत्र हिंदी का सुखद भविष्य तय करने की गारंटी ले सकता है वह है शिक्षा का क्षेत्र। प्राथमिक स्तर पर पूरे देश में हिंदी की शिक्षा को अनिवार्य बनाने का शिक्षा मंत्री कपिल सिब्बल का सुझाव इस लिहाज से बहुत महत्वपूर्ण है। लेकिन क्या इसे स्वीकार करवाना और अमल करवाना इतना आसान होगा? भारत में भाषा को लेकर भावुकता और राजनीति का इतिहास बहुत पुराना है और दक्षिण एवं पूर्वी भारत में इस लिहाज से बड़ी समस्याएं पेश आने वाली हैं। दूसरी ओर राष्ट्रीय ज्ञान आयोग की सिफारिशों पर गौर करना जरूरी है जिसने प्राथमिक शिक्षा में अंग्रेजी की अनिवार्य शिक्षा दिए जाने पर जोर दिया है। उनके लिहाज से भारत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मजबूत बनाने के लिए यह जरूरी है। क्योंकि प्राथमिक कक्षाओं में बच्चे जो पढ़ेंगे वही उनके शैक्षणिक, व्यावसायिक और बौद्धिक भविष्य की नींव बनेगी। ज्ञान आयोग अंग्रेजी के पक्ष में जो दलील दे रहा है, वही हम हिंदी के पक्ष में देना चाहते हैं। प्राथमिक कक्षाओं में हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं की षिक्षा हमारे बच्चों को उनकी मातृभाषाओं के साथ जोड़ने का काम करेगी। आखिर हमारी शिक्षा प्रणाली को क्या अधिकार है कि वह हमारे बच्चों को उनकी अपनी भाषाओं से अलग कर अंग्रेजीदां बनने पर मजबूर करे।

मातृभाषा में शिक्षा

केंद्र सरकार ने शिक्षा का अधिकार विधेयक के रूप में आपने गांव-गांव में शैक्षिक क्रांति की आधारशिला रख दी है। यदि इसे गंभीरता से लागू किया गया तो आने वाले वर्षों में इसके विलक्षण परिणाम सामने आ सकते हैं। किंतु हमें एक और विषय पर ध्यान देना चाहिए और वह है मातृभाषा में शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार। हम अंग्रेजी भाषा की विषेषताओं, उसकी समृद्धि, अंतरराष्ट्रीय विस्तार और उससे हमें होने वाले भारी व्यापारिक लाभ से अनजान नहीं हैं। अंग्रेजी की संपन्नता के प्रति हमारे मन में पूरा सम्मान है लेकिन हमारी अपनी भाषाओं की विपन्नता को लेकर दुख भी है। उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए पहले अंग्रेजी में प्रवीणता प्राप्त करना क्यों अनिवार्य है, यह मुझ जैसे सामान्य हिंदी भाषी की समझ से बाहर है। हमारी भाषाओं में क्यों भौतिकी, रसायन, गणित, कानून, चिकित्सा, प्रबंधन, लेखांकन आदि की उच्च स्तरीय पुस्तकें उपलब्ध नहीं हैं, यह प्रश्न अनुत्तरित ही रह जाता है। आखिर कोई क्यों इस दिशा में काम नहीं करता?

मुझे ऐसा लगता है कि हमने अपने देश में दो तरह के लोगों के वर्ग बना लिए हैं। पहला उन लोगों का जो प्रारंभिक स्तर तक शिक्षा प्राप्त लोग हैं। उन्हें हम हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में अध्ययन करने की सुविधा प्रदान करते हैं। दूसरा वर्ग उन छात्रों का है जो अग्रिम शिक्षा पाना चाहते हैं। हम धीरे-धीरे उन्हें उनकी भाषाओं से अलग कर देते हैं। पहले हम उन्हें अंग्रेजी सिखाते हैं, फिर अंग्रेजी में सिखाते हैं और अंततः अंग्रेजीदां पेशेवर में बदल देते हैं। फिर वे स्वयं को विषेषाधिकार सम्पन्न वर्ग का हिस्सा मानते हैं और अन्य ‘सामान्य‘ लोगों से दूरी बना लेते हैं। यही वर्ग बाद में सत्ता तंत्र में निर्णायक भूमिका में पहुंचता है और अंग्रेजी के हितसाधन में लग जाता है। वह मानता और बताता है कि हिंदी में उच्च स्तरीय कार्य संभव नहीं है।

ऐसा क्यों? शीतयुद्ध के दिनों में जब तत्कालीन सोवियत संघ से आधुनिक विज्ञान की पुस्तकें भारत आती थीं तो मुझे यह देखकर ताज्जुब होता था कि रूसी भाषा में भी न्यूक्लियर फिजिक्स पर इतनी सामग्री उपलब्ध है? सोवियत संघ तो किसी भी मायने में अमेरिका से कम नहीं था। अंतरिक्ष में स्पुतनिक सबसे पहले सोवियत संघ ने ही भेजा उसके बाद अमेरिका को उपग्रह भेजने का ख्याल आया। अपनी ही भाषा में पढ़ते लिखते हुए रूस किसी भी मायने में अमेरिका से कम नहीं था। बल्कि कई मायनों में उससे आगे था। ऐसा कैसे संभव हुआ? फिर फ्रांस, जर्मनी, जापान और चीन के उदाहरण हैं। ये सभी तकनीकी और आर्थिक क्षेत्रों में कितने आगे बढ़ चुके हैं? लेकिन वहां अंग्रेजी पाठ्यपुस्तकों पर निर्भरता नहीं है। कुछ महीने पहले मैं जापान गया और वहां के एक विश्वविद्यालय के पुस्तकालय का दौरा करते समय यह देखकर चौक गया कि सभी आधुनिक विषयों पर जापानी भाषा में उच्च स्तरीय पाठ्यपुस्तकें और संदर्भ पुस्तकें उपलब्ध हैं। वहां अंग्रेजी में पूछने पर मैं विश्वविद्यालय के मुख्य द्वार तक के बारे में जानकारी प्राप्त करने में विफल रहा।

पठन-पाठन की परंपरा

हम हमेशा से ऐसे नहीं थे। कुछ समय पहले संस्कृत में वैज्ञानिक कार्यों का अध्ययन करते समय मैंने पाया कि जिन विशयों क¨ हम गूढ़ या आधुनिक समझते हैं उन पर प्राचीन भारत में भी पठन-पाठन की परंपरा थी। संस्कृत में ऐसे ग्रंथों की कमी नहीं है जिनमें गणित, चिकित्सा विज्ञान, अंतरिक्ष विज्ञान, राजनीति शास्त्र, अर्थशास्त्र आदि का गहरा ज्ञान संकलित है। ब्रह्मभट्ट का ब्रह्मस्फुट सिद्धांत पढ़कर मैं चौस गया। उसमें शून्य के बारे में कमाल के नियम दिए हुए थे। ऐसे नियम जिनका आज हम न सिर्फ गणित बल्कि कंप्यूटर विज्ञान में भी, जिससे मेरा संबंध है, प्रयोग करते हैं। अठारहवीं शताब्दी में सर अलेक्जेंडर जान्स्टन ने पार्लियामेंट में कहा था कि भारतीयों ने लाजिक और मेटा-फिजिक्स में 1500 ईस्वी पूर्व में ही प्रवीणता प्राप्त कर ली थी। कानून, आंकिक प्रणालियों, नक्षत्र विज्ञान आदि में वे बहुत आगे थे।

यहां मेरा तात्पर्य सिर्फ यह है कि भारतीय भाषाओं में उच्च अध्ययन और ग्रंथों के लेखन की परंपरा पुराने समय से मौजूद थी। यह परंपरा बाद में न जाने कहां खो गई और अफसोस तो यह कि आज भी हालात बहुत नहीं बदले हैं। हमें अपने बच्चों को अंग्रेजी जरूर पढ़ानी चाहिए लेकिन हम पूरे देश को अंग्रेजी नहीं पढ़ा सकते। हमारी ज्यादातर आबादी गांव-कस्बों में रहती है जो अपनी क्षेत्रीय भाषाओं में अधिक सुविधा महसूस करती है। हम अध्ययन को कम कष्ट साध्य बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं तो भारतीय भाषाओं में उच्च कोटि के ग्रंथों तथा पाठ्यपुस्तकों के निर्माण को¨ लेकर एक बड़ी योजना बनाए जाने की जरूरत है। वह हमारे बढ़ते भारत की जरूरतों के अनुकूल होगी और तब गांव-कस्बे में रहने वाला युवक एम्पावर होगा। वह खुद भी विकसित हो सकेगा और देश की समग्र तरक्की में भी हाथ बंटा सकेगा। जरूरी है कि हिंदी को प्राथमिक कक्षाओं में देश भर में पढ़ाया जाए, उसे रोजगार की भाषा बनाया जाए और उसके प्रति हीनता का भाव खत्म हो। अगर हम इतना कर लें तो फिर आने वाले दशकों में हिंदी की स्थिति का अनवरत आकलन करते रहने की जरूरत नहीं होगी।

(प्रभासाक्षी से साभार)

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