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माह अक्तूबर-२००९

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विशेष आलेख

‘‘हिंदी दिवस के विरुद्ध’’

-आलोक मेहता

आपसे कोई सवाल पूछे-‘आप क्या साल में कुछ दिन अपनी माता या पिता का स्मरण करते हैं?’ दूसरा कोई पूछे-‘गांधी जी और उनके आदर्शों को 2 अक्टूबर के अलावा क्यों याद किया जाना चाहिए?’ साथ में खड़ा कोई तीसरा सवाल करे-‘अपने इष्ट देवी-देवता की एक दिन पूजा-अर्चना के बाद यदि साल भर आपके उपासना स्थल पर कोई गंदगी बरसाता रहे तो कैसा लगेगा?’ पता नहीं, मेरी तरह हमारे सुधी पाठकों को कभी गुस्सा आता है या नहीं। लेकिन कोई बहुराष्ट्रीय कंपनी राष्ट्रीय स्तर पर ही नहीं, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी लाखों लोगों के बीच सर्वे करवाए तो निष्कर्ष यही निकलेगा कि तीनों सवालों के उत्तर देने वाले क्रोधित होने के साथ-साथ एक हद तक मारपीट के लिए तैयार हो जाएंगे। इसलिए पितरों के श्राद्धपक्ष में 13 सितंबर को जब एक युवा ने मुझसे टीवी चैनल पर सवाल पूछा कि ‘आप हिंदी दिवस मनाना कितना उचित समझते हैं?’ पोंगापंथी और सरकारी शैली में ‘हाय मेरी हिंदी’ कहने के बजाय मेरा उत्तर था-‘मैं हिंदी दिवस मनान के बिलकुल विरुद्ध हूं। जिस तरह अपने माता-पिता, देवी-देवता, खुदा, यीशु को हर दिन याद किया जाना चाहिए, उसी तरह भारत में साल में हर दिन राष्ट्रभाषा हिंदी को याद रखते हुए उसकी रक्षा के लिए सोचा जाना चाहिए।’

हिंदी दिवस के विरुद्ध मेरी बातों से शायद बहुत से लोग नाराज होंगे। जब हम सांप्रदायिक कट्टरपंथियों या कम्युनिस्टों के पाखंड के विरुद्ध लिखते हैं तो वे नाराज नहीं होते। जब धर्मस्थलों पर झूठे आडंबरों में लोगों को फंसाने वालों का पदाफाश होता है तो सराहना होती है। फिर हिंदी के नाम पर लगभग 50 करोड़ लोगों को धोखा देने वालों की भत्र्सना करते हुए हिंदी दिवस, सप्ताह और महीने के तमाशे पर करोड़ों रुपये बहाने वालों के विरुद्ध कोई मोर्चा क्यों नहीं बनता?

वास्तविकता यह है कि महात्मा गांधी, पं.जवाहरलाल नेहरू, डा.राजेंद्र प्रसाद जैसे महापुरुषों ने हिंदी-हिंदुस्तानी को राष्ट्रभाषा के रूप में अपनाने के लिए आजादी के पहले और बाद में अभियान चलाने के साथ संविधान में प्रावधान किया लेकिन आजादी के 62 साल बाद भी भारत सरकार का गृह मंत्रालय 2009-10 के वार्षिक कार्यक्रम में राजकीय कार्य हिंदी में करने के लिए विचारणीय बिंदु की संज्ञा देते हुए केवल रुदन कर रहा है। विशेष रूप से विचारणीय बिंदु के रूप में बताया गया है-‘यह जरूरी है कि संसदीय राजभाषा समिति की रिपोर्ट के सात खंडों पर जारी किए गए राष्ट्रपति के आदेशों का मंत्रालयों, विभागों, कार्यालयों द्वारा अनुपालन किया जाए।’ एक तरफ ‘राष्ट्रपति के आदेश’ का जिक्र है और निर्देश विचारणीय बिंदु का है। इसी तरह हिंदी में कामकाज में प्रशिक्षण में ‘तीव्रता’ लाने और राजभाषा अधिकारियों को विभाग के कार्यकलापों से परिचित कराने, मंत्रालयों की संगोष्ठियां हिंदी में करने इत्यादि को विचारणीय बिंदु कहा गया है।

यह तो एक बानगी है। गृह मंत्रालय, विदेश मंत्रालय, वित्त मंत्रालय सहित अधिकतर सरकारी विभागों में हिंदी के नाम पर आंकड़ेबाजी से हिंदी को ‘श्रद्धांजलि’ दे दी जाती है। मोटे तौर पर माना जाता है कि भारत में कम से कम 18 करोड़ लोगों की मातृभाषा, 30 करोड़ की दूसरी भाषा हिंदी है और लगभग दो करोड़ लोग अन्य देशों में हिंदीभाषी हैं। दो साल पहले न्यूयाॅर्क में धूमधाम से 100 करोड़ रुपये के बजट से संयुक्त राष्ट्र में हिंदी भाषा के प्रयोग की व्यवस्था की घोषणा के बाद विदेश मंत्रालय के मंत्रियों या अधिकारियों को पता भी नहीं है कि उनके मंत्रालयों में हिंदी का संयुक्त सचिव तक कौन है?

अंतरराष्ट्रीय मंच की बात दूर रही, भारत सरकार अपने पूरे विज्ञापन बजट का 60 से 70 प्रतिशत हिस्सा केवल अंग्रेजी समाचार माध्यमों पर उड़ा देती है जबकि हिंदी और भारतीय भाषाओं के पाठक और दर्शक अंग्रेजी से कई सौ गुना ज्यादा हैं। इसी तरह अधिकतर सरकारी मंत्रालयों और विज्ञाग के सरकारी विज्ञापन हिंदी के नाम पर घिसी-पिटी, क्लिष्ट तथा भ्रष्ट भाषा में तैयार होते हैं कि हिंदीभाषी को अंग्रेजी के दस्तावेज देखकर असली अर्थ समझना होता है। मान लीजिए, कांग्रेस पाटी गांधी-नेहरू के आदर्शों को भूल गई लेकिन हिंदू-हिंदी वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक भी केवल अंग्रेजी में इंटरव्यू देकर गौरवान्वित होने लगे हैं। राष्ट्रीय स्तर पर भाजपाई नेताओं के सलाहकार या बेटे-बेटियां भी क्या हिंदी में लिखना-पढ़ना गौरवपूर्ण मानते हैं? मजदूर-किसानों के नाम पर राजनीति करने वाले अधिकतर कम्युनिस्ट तो हिंदी लिखने-बोलने की हालत में ही नहीं हैं। ऐसी हालत में केवल माता-पिता की कृपा, उदारता और आशीर्वाद से उऋण होने के लिए केवल एक दिन नमन करने की तरह 14 सितंबर को ‘हिंदी दिवस’ के रूप में नमन करना बहुत ही गलत और पाप की तरह है।

(नई दुनिया से साभार)

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