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माह अक्तूबर-२००९

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गांधी जयंती-२००९ के अवसर पर विशेष आलेख

91 वर्ष बाद भी हम कहाँ हैं?

महात्मा गांधी जी द्वारा दिनांक 28 मार्च, 1918 को ‘हिन्दी साहित्य सम्मेलन, इन्दौर’ में पढ़ा ‘‘अध्यक्षीय भाषण’’

युवराज, सभापति, भाइयों और बहनों,

हमारे पूज्यनीय और स्वार्थ-त्यागी नेता पंडित मदनमोहन मालवीय नहीं आ सके। मैंने उनसे प्रार्थना थी कि जहां तक बने सम्मेलन में उपस्थित रहियेगा। उन्होंने वचन दिया था कि वे जरूर आयेंगे। पंडित जी सम्मेलन में तो उपस्थित नहीं हुये, पर उन्होंने एक पत्र भेज दिया है। मैं उम्मीद करता था कि यदि पंडित जी नहीं आयेंगे तो उनका पत्र अवश्य आयेगा और उसे मैं आप लोगों के सामने उपस्थित कर सकूंगा। यह पत्र मुझे आज मिला है। मैंने स्वागतकारिणी सभा को हिन्दी के विषय में विद्वानों से दो प्रश्नों पर सम्मति लेने के लिये कहा था, उन्हीं का उत्तर पंडितजी ने अपने पत्र में दिया है।

(मालवीय जी का पत्र पढ़कर गांधीजी ने इस प्रकार कहा)

"भाइयो और बहनों,

मैं दिलगीर हूं कि जो व्याख्यान सम्मेलन में देने का मेरा इरादा था, वह आपके सामने नहीं रख सका हूं। मैं बड़ी झंझटों में पड़ा हूं। मेरी इस समय दुर्दशा है। इससे मैं काम नहीं कर सकता। पर मैंने वादा किया था कि मैं आऊंगा और आ गया; किन्तु जो चीज सामने रखने का इरादा था नहीं रख सका।

यह भाषा का विषय बड़ा भारी और बड़ा ही महत्वपूर्ण है। यदि सब नेता सब काम छोड़कर केवल इसी विषय पर लगे रहे, तो बस है। यदि हम लोग भाषा के प्रश्न को गौण समझें या इधर से मन हटा लेंगे, तो इस समय लोगों में जो प्रवृत्ति चल रही है, लोगों के हृदय में जो भाव उत्पन्न हो रहा है, वह निष्फल हो जायेगा।

भाषा माता के समान है। माता पर हमारा जो प्रेम होना चाहिये वह हम लोगों में नहीं है। वास्तव में मुझे तो ऐसे सम्मेलनों से प्रेम नहीं है। तीन दिन का जलसा होगा। तीन दिन कह सुनकर (आगे) जो करना चाहिये उसे हम भूल जायेंगे। सभापति के भाषण में तेज नहीं है, जिस वस्तु की आवश्यकता है वह वस्तु उसमें नहीं है। इससे बड़ी कंगाली की मैं कल्पना नहीं कर सकता। हम पर और हमारी प्रजा के ऊपर एक बड़ा आक्षेप यह है कि हमारी भाषा में तेज नहीं है। .......... जब हममें तेज आयेगा, तभी हमारी प्रजा में, हमारी भाषा में तेज आयेगा। विदेशी भाषा द्वारा आप जो स्वातंत्रय चाहते हैं वह नहीं मिल सकता, क्योंकि उसके हम योग्य नहीं हैं।

प्रसन्नता की बात है कि इन्दौर में सब कार्य हिन्दी में होता है पर क्षमा कीजियेगा, प्रधानमंत्री साहब का जो पत्र आया है, वह अंग्रेजी में है। इन्दौर की प्रजा यह बात नहीं जानती होगी पर मैं उसे बतलाता हूं कि यहां अदालतों में प्रजा की अर्जियां हिन्दी में ली जाती हैं, पर न्यायाधीशों के फैसले और वकील तथा बैरिस्टरों की बहस अंग्रेजी में होती है। मैं पूछता हूं कि इन्दौर में ऐसा क्यों होता है ? हां, मैं यह मानता हूं, कि अंग्रेजी राज्य में यह आन्दोलन सफल नहीं हो सकता। यह ठीक है, पर देशी राज्यों में तो सफल होना ही चाहिये। शिक्षित वर्ग अंग्रेजी के मोह में फंस गया है और अपनी राष्ट्रीय भाषा से उसे असन्तोष हो गया है। पहली माता (अंग्रेजी) से हमें जो दूध मिल रहा है, उसमें जहर और पानी मिला हुआ है, और दूसरी माता मातृभाषा से शुद्ध दूध मिल सकता है। बिना इस शुद्ध दूध के मिले हमारी उन्नति होना असंभव है। पर जो अन्धा है वह देख नहीं सकता। गुलाम यह नहीं जानता कि अपनी बेड़ियां किस तरह तोड़े। पचास वर्षों से हम अंग्रेजी के मोह में फंसे हैं। हमारी प्रजा अज्ञान में डूबी रही है। सम्मेलन को इस ओर विशेष रूप से ख्याल रखना चाहिये। हमें ऐसा उद्योग करना चाहिये कि एक वर्ष में राजकीय सभाओं में, कांग्रेस में, प्रान्तीय सभाओं में और अन्य सभा-समाज और सम्मेलनों में अंग्रेजी का एक भी शब्द सुनाई न पड़े। हम अंग्रेजी का व्यवहार बिलकुल त्याग दें। अंग्रेजी सर्व-व्यापक भाषा है पर यदि अंग्रेज सर्व-व्यापक न रहेंगे, तो अंग्रेजी भी सर्व-व्यापक न रहेगी। हमें अब अपनी मातृ-भाषा की और उपेक्षा करके उसकी हत्या नहीं करनी चाहिये। जैसे अंग्रेज अपनी मादरी जुबान अंग्रेजी में ही बोलते और सर्वथा उसे ही व्यवहार में लाते हैं, वैसे ही मैं आपसे प्रार्थना करता हूं कि आप हिन्दी को राष्ट्र भाषा का गौरव प्रदान करें। हिन्दी सब समझते हैं। इसे राष्ट्र भाषा बनाकर हमें अपने कर्तव्य का पालन करना चाहिये।...."अब मैं अपना लिखा हुआ भाषण पढ़ता हूं।

श्रीमान सभापति महाशय, प्यारे प्रतिनिधिगण, बहनो और भाइयो,

आपने मुझे इस सम्मेलन का सभापतित्व देकर कृतार्थ किया है। हिन्दी साहित्य की दृष्टि से मेरी योग्यता इस स्थान के लिये कुछ भी नहीं है। यह मैं खूब जानता हूं। मेरा हिन्दी भाषा का असीम प्रेम ही मुझे यह स्थान दिलाने का कारण हो सकता है। मैं उम्मीद करता हूं कि प्रेम की परीक्षा में मैं हमेशा उत्तीर्ण होऊंगा।

साहित्य का प्रदेश भाषा की भूमि जानने पर ही निश्चित हो सकता है। यदि हिन्दी भाषा की भूमि सिर्फ उत्तरप्रान्त की होगी, तो साहित्य का प्रदेश संकुचित रहेगा। यदि हिन्दी भाषा, राष्ट्रीय भाषा होगी, तो साहित्य का विस्तार भी राष्ट्रीय होगा। जैसे भाषक वैसी भाषा। भाषा-सागर में स्नान करने के लिये पूर्व-पश्चिम-दक्षिण-उत्तर से पुनीत महात्मा आयेंगे, तो सागर का महत्व स्नान करने वालों के अनुरूप होना चाहिये। इसलिये साहित्य की दृष्टि से भी हिन्दी भाषा का ध्यान विचारणीय है।

हिन्दी भाषा की व्याख्या का थोड़ा-सा ख्याल करना आवश्यक है। मैं कई बार व्याख्या कर चुका हूं कि हिन्दी भाषा वह भाषा है, जिसको उत्तर में हिन्दू व मुसलमान बोलते हैं और नागरी अथवा फारसी लिपि में लिखी जाती है। यह हिन्दी एकदम संस्कृतमयी नहीं है, न वह एकदम फारसी शब्दों से लदी है। देहाती बोली में जो माधुर्य मैं देखता हूं वह लखनऊ के मुसलमान भाइयों की बोली में और न प्रयाग के पंडितों की बोली में पाया जाता है। भाषा वही श्रेष्ठ है जिसको जन-समूह सहज में समझ ले। देहाती बोली सब समझते हैं। भाषा का मूल करोड़ों मनुष्यरूपी हिमालय में मिलेगा, और उसमें ही रहेगा। हिमालय से निकली हुई गंगाजी अनन्त काल तक बहती रहेंगी। ऐसा ही देहाती हिन्दी का गौरव रहेगा और जैसे छोटी-सी पहाड़ी से निकला हुआ झरना सूख जाता है वैसे ही संस्कृतमयी तथा फारसीमयी हिन्दी की दशा होगी।

हिन्दू-मुसलमानों के बीच जो भेद किया जाता है, वह कृत्रिम है। ऐसी ही कृत्रिमता हिन्दी व उर्दू भाषा के भेद में है। हिन्दुओं की बोली से फारसी शब्दों का सर्वथा त्याग और मुसलमानों की बोली से संस्कृत का सर्वथा त्याग अनावश्यक है। दोनों का स्वाभाविक संगम गंगा-जमुना के संगम सा अचल रहेगा। मुझे उम्मीद है कि हम हिन्दू हिन्दी-उर्दू के झगड़े में पड़ कर अपना बल क्षीण नहीं करेंगे। लिपि की कुछ तकलीफ जरूर है। मुसलमान भाई अरबी लिपि में लिखेंगे, हिन्दू बहुत करके नागरी-लिपि में लिखेंगे। राष्ट्र में दोनों का स्थान मिलना चाहिये। अमलदारों को दोनों लिपियों का ज्ञान अवश्य होना चाहिये। इसमें कुछ कठिनाई नहीं है। अन्त में जिस लिपि में ज्यादा सरलता होगी, उसकी विजय होगी। भारत वर्ष में परस्पर व्यवहार के लिये एक भाषा होनी चाहिये। इसमें कुछ संदेह नहीं है। यदि हम हिन्दी-उर्दू का झगड़ा भूल जायें तो हम जानते हैं कि मुसलमान भाइयों की तो उर्दू ही राष्ट्रीय भाषा है। इस बात से सहज में ही सिद्ध हो जाता है कि हिन्दी मुगलों के जमाने से राष्ट्रीय भाषा बनती जाती थी।

आज भी हिन्दी से स्पर्धा करनेवाली दूसरी कोई भाषा नहीं है। हिन्दी-उर्दू का झगड़ा छोड़ने में राष्ट्रीय भाषा का सवाल सरल हो जाता है। हिन्दुओं को फारसी शब्द थोड़े बहुत जानने पड़ेंगे। इस्लामी भाइयों को संस्कृत शब्दों का ज्ञान सम्पादन करना पड़ेगा। ऐसे लेन-देन से इस्लामी भाषा का बल बढ़ जायेगा, और हिन्दू मुसलमानों की एकता एक बड़ा साधन हमारे हाथ में आ जायेगा। अंग्रेजी भाषा का मोह दूर करने के लिये इतना अधिक परिश्रम करना पड़ेगा कि हमें लाजिम है कि हम हिन्दी-उर्दू का झगड़ा न उठावें। लिपि की तकरार भी हमको नहीं करनी चाहिये।

अंग्रेजी भाषा राष्ट्रीय भाषा क्यों नहीं हो सकती, अंग्रेजी भाषा का बोझ प्रजा के ऊपर रखने से क्या हानि होती है, हमारी शिक्षा का माध्यम आज तक अंग्रेजी होने से प्रजा कैसे कुचल दी गई है, हमारी जातीय भाषा क्यों कंगाल हो रही है, इन सब बातों पर मैं अपनी राय भागलपुर और भड़ोंच के व्याख्यानों में दे चुका हूं। इसलिये यहां मैं फिर नहीं देना चाहता। इन दोनों व्याख्यानों में से भाषा संबंधी भाग मैं इस व्याख्यान के परिशिष्ट में रख दूंगा। हकीकत में इस बात में संदेह नहीं हो सकता कि हमारे कविवर सर रवीन्द्रनाथ टैगोर, विदुषी ऐनी बेसेन्ट, लोक मान्य तिलक और अन्यान्य प्रतिष्ठित आप्त व्यक्तियों का मन्तव्य इस विषय में ऐसा ही है। कार्य की सिद्धि में कठिनाइयां तो होंगी ही, किन्तु उसका उपाय करना हम सब पर निर्भर है। लोकमान्य तिलक महाराज ने अपना कार्य करके बता दिया कि उन्होंने ‘केसरी’ और ‘मराठा’ में हिन्दी विभाग शुरू कर दिया है। भारत-रत्न पंडित मदनमोहन मालवीय का अभिप्राय भी हिन्दुस्तान में अज्ञात नहीं है। तो भी हमें मालूम है कि हमारे कई विद्वान नेताओं का अभिप्राय है कि कुछ वर्षों तक तो अंग्रेजी ही राष्ट्रीय भाषा रहेगी। इन नेताओं से हम विनयपूर्वक कहेंगे कि अंग्रेजी के इस मोह से प्रजा पीड़ित हो रही है। अंग्रेजी शिक्षा पानेवालों के ज्ञान का लाभ प्रजा को बहुत ही कम मिलता है और अंग्रेजी शिक्षित वर्ग और आप लोगों के बीच बड़ा दरयाव आ पड़ा है।

कहना आवश्यक नहीं कि मैं अंग्रेजी भाषा से द्वेष नहीं करता हूं। अंग्रेजी-साहित्य-भण्डार से मैंने भी बहुत रत्नों का उपयोग किया है। अंग्रेजी भाषा की मारफत हमें विज्ञान आदि का खूब ज्ञान लेना है। अंग्रेजी का ज्ञान भारतवासियों के लिये बहुत आवश्यक है। लेकिन इस भाषा को उसका उचित स्थान देना एक बात है, उसकी जड़-पूजा करना दूसरी बात है।

हिन्दी-उर्दू राष्ट्रीय भाषा होनी चाहिये, इस बात की सिफारिश स्वीकार करने से हमारा मनोरथ सिद्ध नहीं हो सकता है। तो फिर हम किस प्रकार सिद्धि पा सकेंगे। जिन विद्वानों ने इस मण्डप को सुशोभित किया है, वे भी अपनी वक्तृता हमको इस विषय में जरूर सुनायेंगे। मैं सिर्फ भाषा-प्रचार के बारे में कुछ कहूंगा। भाषा-प्रचार के लिये हिन्दी-शिक्षक होना चाहिये। हिन्दी बंगाली सीखने वालों के लिये एक छोटी सी पुस्तक मैंने देखी है। वैसी मराठी में भी है। अन्य भाषा-भाषियों के लिये ऐसी किताबें देखने में नहीं आई हैं। यह काम करना जैसा सरल है वैसा ही आवश्यक है। मुझे उम्मीद है कि यह सम्मेलन इस कार्य को शीघ्रता से अपने हाथ में लेगा। ऐसी पुस्तकें विद्वान और अनुभवी लेखकों के द्वारा लिखवानी चाहिये।

सबसे कष्टदायी मामला द्रविड़-भाषाओं के लिये है। वहां तो कुछ प्रयत्न ही नहीं हुआ है। हिन्दी भाषा सिखाने वाले शिक्षकों को तैयार करना चाहिये। ऐसे शिक्षकों की बड़ी ही कमी है। ऐसे एक शिक्षक प्रयाग से आपके लोकप्रिय मन्त्री भाई पुरुषोत्तम दास टण्डन के द्वारा मुझे मिले थे।

हिन्दी भाषा का एक भी सम्पूर्ण व्याकरण मेरे देखने में नहीं आया। जो है सो अंग्रेजी में विलायती पादरियों के बनाये हुये हैं। ऐसा एक व्याकरण डा. केलाग का रचा हुआ है। हिन्दुस्तान की अन्यान्य भाषाओं का मुकाबला करने वाला व्याकरण हमारी भाषा में होना चाहिये। हिन्दी प्रेमी विद्वानों से मेरी नम्र विनती है कि वे इस त्रुटि को दूर करें। हमारी राष्ट्रीय सभाओं में हिन्दी भाषा का ही इस्तेमाल होना आवश्यक है। कांग्रेस के कार्यकर्ताओं और प्रतिनिधियों द्वारा यह प्रयत्न होना चाहिये। मेरा अभिप्राय है कि यह सभा ऐसी प्रार्थना आगामी कांग्रेस में उसके कर्मचारियों के सम्मुख उपस्थित करे।

हमारी कानून सभाओं में भी राष्ट्रीय भाषा द्वारा कार्य चलना चाहिये। जब तक ऐसा नहीं होता, तब तक प्रजा को राजनीतिक कार्यों में ठोस तालीम नहीं मिलती है। हमारे हिन्दी अखबार इस कार्य को थोड़ा-सा करते तो हैं लेकिन प्रजा को तालीम अनुवाद से नहीं मिल सकती है। हमारी अदालतों में जरूर राष्ट्रीय भाषा और प्रान्तीय भाषा का प्रचार होना चाहिये। न्यायाधीशों की मार्फत जो तालीम हमको सहज ही मिल सकती है, उस तालीम से आज प्रजा वंचित रहती है।

भाषा की जैसी सेवा हमारे राजा महाराजा लोग कर सकते हैं वैसी अंग्रेज सरकार नहीं कर सकती है। महाराजा होलकर की कौन्सिल में, कचहरी में और हर एक काम में हिन्दी का और प्रान्तीय बोली का ही प्रयोग होना चाहिये। उनके उत्तेजन से भाषा और बहुत ही बढ़ सकती है। इस राज्य की पाठशालाओं में शुरू से आखिर तक सब तालीम मादरी जबान में देने का प्रयोग होना चाहिये। हमारे राजे-महाराजाओं से भाषा की बड़ी भारी सेवा हो सकती है। मैं उम्मीद रखता हूं कि होलकर महाराज और उनके अधिकारी वर्ग इस महान कार्य को उत्साह से उठा लेंगे।

ऐसे सम्मेलन से हमारा सब कार्य सफल होगा, ऐसी समझ भ्रम ही है। जब हम प्रतिदिन इसी कार्य की धुन में लगे रहेंगे, तभी इस कार्य की सिद्धि हो सकेगी। सैकड़ों स्वार्थ-त्यागी विद्वान जब इस कार्य को अपनायेंगे तभी सिद्धि संभव है।

मुझे खेद तो यह है कि जिन प्रान्तों की मातृभाषा हिन्दी है, वहां भी उस भाषा की उन्नति करने का उत्साह नहीं दिखायी देता। उन प्रान्तों में हमारे शिक्षित वर्ग आपस में पत्र-व्यवहार और बातचीत अंग्रेजी में करते हैं। एक भाई लिखते हैं कि हमारे अखबार चलाने वाले अपना व्यवहार अंग्रेजी की मारफत करते हैं। अपने हिसाब-किताब वे अंग्रेजी में ही रखते हैं। फ्रांस में रहने वाले अंग्रेज अपना सब व्यवहार अंग्रेजी में रखते हैं। हम अपने देश में अपने महत् कार्य विदेशी भाषा में करते हैं। मेरा नम्र लेकिन दृढ़ अभिप्राय है कि जब तक हम हिन्दी भाषा को राष्ट्रीय और अपनी अपनी प्रान्तीय भाषाओं को उनका योग्य स्थान नहीं देते तब तक स्वराज्य की सब बातें निरर्थक हैं। इस सम्मेलन द्वारा भारतवर्ष के इस बड़े प्रश्न का निराकरण हो जाय, ऐसी मेरी आशा और प्रभु के प्रति प्रार्थना है।

(‘‘मध्यप्रदेश और गांधी जी’’ पुस्तक से साभार)

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