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विश्व जाल पत्रिका अनुरोध भारतीय भाषाओं के प्रतिष्ठापन के लिए समर्पित समस्त संस्थाओं को एकमंच पर लाने हेतु प्रयासरत है। इस विश्व-जाल पत्रिका का प्रकाशन एवं संपादन अवैतनिक अव्यावसायिक एवं मानसेवी होकर समस्त हिन्दी प्रेमियों को समर्पित है। |
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¤सम्पादकीय कार्यालय : एल.आई.जी., ए.एस.१६/१७, गणपति एन्क्लेव, कोलार रोड, भोपाल-४६२०४२(म.प्र.)¤ ई-मेल : anurodh55@yahoo.com |
संपादक दुर्गेश गुप्त "राज" |
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सम्पादकीय हिंदी-दिवस आया और चला गया हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी हिंदी-दिवस आया और चला गया। सरकारी विभागों, उपक्रमों, मंत्रालयों की व्यस्तता कुछ बढ़ गई हिंदी के लिये। कहीं हिंदी माह, तो कहीं हिंदी सप्ताह, तो कहीं हिंदी-दिवस के रूप में इसे मनाया गया। राजभाषा के नाम पर हिंदी प्रतियोंगिताओं का आयोजन, नाटकों का मंचन, कवि-सम्मेलन, कवि-गोष्ठियां, हिंदीभाषी साहित्यकारों के सम्मान कार्यक्रमों का आयोजन किया गया। कुछ संस्थानों द्वारा उनके कार्यालयों में स्थान न होने के कारण शहर के मंहगे होटलों में गोष्ठियों का आयोजन किया गया। यानि कि कुछ मिलाकर यों कहिये कि राजभाषा के नाम जो निधि आबंटित हुई थी उसका उपयोग उनके द्वारा किया गया। यदि गैर सरकारी या सरकारी मदद से चलने वाली साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्थाओं की बात करें, तो उनके द्वारा भी बड़ी ही धूमधाम से हिंदी-दिवस के अवसर पर विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन, हिंदीसेवी संपादकों, पत्रकारों, साहित्यकारों के सम्मान जैसे कार्यक्रमों का आयोजन किया गया। हिंदीसेवियों के सम्मान के लेकर जब देश की जानी-मानी संस्था के प्रमुख से मैंने कहा कि अपनी भाषा के लिये सम्मान की क्या आवश्यकता ? तो उनका कहना था कि हम तो वर्षों से इस प्रकार के आयोजन करते आ रहे हैं, अतः हम तो यह काम करेंगे। इस संबंध में पं.मदनमोहन मालवीय के 1918 में महात्मागांधी को लिखे पत्र के अंश याद आ रहे हैं जिसे महात्मा गांधी जी द्वारा ‘‘हिन्दी साहित्य सम्मेलन, इन्दौर’’ के अपने ‘अध्यक्षीय भाषण’ के दौरान 28 मार्च, 1918 को पढ़ा था, उसमें मालवीय जी द्वारा ऐसे सम्मेलनों के तारतम्य में लिखा था-"भाषा माता के समान है। माता पर हमारा जो प्रेम होना चाहिये वह हम लोगों में नहीं है। वास्तव में मुझे तो ऐसे सम्मेलनों से प्रेम नहीं है। तीन दिन का जलसा होगा। तीन दिन कह सुनकर (आगे) जो करना चाहिये उसे हम भूल जायेंगे। ..." आज भी 91 वर्ष उपरांत भी स्थिति जस की तस है। आजादी के 62 वर्षों बाद भी हिंदी के प्रचार-प्रसार के नाम पर करोड़ों रुपये का अपव्यय किया जाना क्या समझदारी कही जायेगी। विशेषकर हिंदीभाषी राज्यों में जहां की राजकाज की भाषा हिंदी है, जहां रहने वाले हिंदी को दैनिक व्यवहार में उपयोग करते हों। कम से कम हिंदीभाषी राज्यों में तो इस प्रकार के आयोजन बंद होने ही चाहिये। इन राज्यों में संसदीय राजभाषा समिति की सिफारिशों को कड़ाई से पालन करने के निर्देश दिये जाने चाहिये। इस संबंध में नई दुनिया के प्रधान संपादक श्री आलोक मेहता की हिंदी दिवस के अवसर पर प्रकाशित ‘विशेष टिप्पणी’ ‘हिंदी दिवस के विरुद्ध’ से सहमत होते हुये उस आलेख का प्रकाशन इस अंक में कर रहा हूँ। मेहता जी का कहना है कि ‘‘मैं हिंदी दिवस मनाने के बिलकुल विरुद्ध हूं।---- यह भी देखें : |
मुख्य समाचारहिन्दी को प्रौद्योगिकी की दृष्टि से संपन्न करें: प्रतिभा
विधि आयोग के इंकार पर शुरू किया अभियान: हिंदी के लिए वकीलों का शंखनाद अंग्रेजी से सांस्कृतिक पहचान को खतराः राहुल देव भारतीय दूतावास द्वारा चीन के 7 हिन्दी विद्वान सम्मानित
सूरीनाम में हिंदी पखवाड़ा एवं मास्को में धूमधाम से मनाया गया हिन्दी दिवस
यह भी देखें : |
विशेष आलेख91 वर्ष बाद भी हम कहाँ हैं?
(महात्मा गांधी जी द्वारा दिनांक 28 मार्च, 1918 को ‘हिन्दी साहित्य सम्मेलन, इन्दौर’ में पढ़ा ‘‘अध्यक्षीय भाषण’’) युवराज, सभापति, भाइयों और बहनों, ‘‘हिंदी दिवस के विरुद्ध’’
आपसे कोई सवाल पूछे-‘आप क्या साल में कुछ दिन अपनी माता या पिता का स्मरण करते हैं?’ दूसरा कोई पूछे-‘गांधी जी और उनके आदर्शों को 2 अक्टूबर के अलावा क्यों याद किया जाना चाहिए?’ साथ में खड़ा कोई तीसरा सवाल करे-‘अपने इष्ट देवी-देवता की एक दिन पूजा-अर्चना के बाद यदि साल भर आपके उपासना स्थल पर कोई गंदगी बरसाता रहे तो कैसा लगेगा?’ पता नहीं, मेरी तरह हमारे सुधी पाठकों को कभी गुस्सा आता है या नहीं। लेकिन कोई बहुराष्ट्रीय कंपनी राष्ट्रीय स्तर पर ही नहीं, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी लाखों लोगों के बीच सर्वे करवाए तो निष्कर्ष यही निकलेगा कि तीनों सवालों के उत्तर देने वाले क्रोधित होने के साथ-साथ एक हद तक मारपीट के लिए तैयार हो जा----पूरा आलेख पढ़ें। पिछड़ेपन की भाषा बनने को अभिशप्त नहीं हिंदी
हिंदी की यात्रा सफलता और नाकामी के कई विरोधाभासी अर्धविरामों एवं अल्पविरामों से आगे बढ़ती हुई अपनी मौजूदा स्थिति तक आ पहुंची है। यात्रा अभी जारी है और मंजिल अभी दूर। एक क्षेत्र में कुछ कदम आगे बढ़ना और दूसरे में कुछ कदम पीछे हट जाना ही पिछले छह दशकों में हिंदी की विकास यात्रा का फलित है। कुछ विद्वानों ने हाल के वर्षों में अंग्रेजी के सांस्कृंतिक-सामाजिक प्रभुत्व को लेकर गंभीर चिंता प्रकट की हैं। उनकी चिंता अनावश्यक नहीं है। उसे लेकर सतर्क होने की जरूरत है। लेकिन यह मानने का कोई बड़ा कारण नजर नहीं आता कि आने वाले पच्चीस या पचास साल में हिंदी दूसरे दर्जे ----पूरा आलेख पढ़ें। यह भी देखें : |
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हिन्दी के औजारइंटरनेट पर हिन्दी के संसाधन और औजार-टूल्स<>अनुनाद व नारायण प्रसाद रचित फ़ॉन्ट परिवर्तन डाउनलोड फ़ॉन्ट रूपांतर डाउनलोड<>हिन्दी में कम्प्यूटर पर कैसे लिखें<>हिन्दी भाषा सॉफ़्टवेयर डाउनलोड कड़ी | ||||||
हमारा उद्देश्य हमारा उद्देश्य राष्ट्रभाषा हिन्दी एवं भारतीय
भाषाओं की रक्षा एवं देवनागनरी लिपि एवं अन्य भारतीय लिपियों की रक्षा
करना है। जरा विचार करें जब भारतीय भाषाएं एवं लिपियां ही नहीं रहेंगी तो
इन भाषाओं में लिखे गये साहित्य को कौन पढ़ेगा ? भाषाओं का सम्बन्ध सीधे
संस्कृति से जुड़ा होने के कारण जब भाषाएं ही नहीं रहेंगी तो संस्कृति भी
धीरे-धीरे विलुप्त हाती जाएगी। अत: भाषा एवं संस्कृति के संरक्षण में आप
अपना योगदान किस प्रकार कर सकते हैं, कृपया ई-मेल द्वारा सूचित करें ताकि
इनका प्रकाशन इस जाल-स्थल पर किया जा सके। इस जाल-स्थल को माह अक्तूबर, २००९ में अद्यतन किया गया।
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